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रत्नावली नाटिका (सम्राट हर्षवर्धन - शास्त्रीय नाटिका रत्न सम्पूर्ण ४ अङ्क सान्वय सटीक)

रत्नावली नाटिका (सम्राट हर्षवर्धन - शास्त्रीय नाटिका रत्न सम्पूर्ण ४ अङ्क सान्वय सटीक)

Ratnavali Natika of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished520 पृष्ठ

पृष्ठ 291, कुल 520 में से

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पृष्ठ 291

246 · रत्नावली
वासवदत्ता—तदो तहिं ज्जेव्व गच्छह्म । (क)
काञ्चनमाला—एदु एदु, भद्दिणी ! (ख)
( इति परिक्रामतः )
( ततः प्रविशत्युपविष्टः कृतावगुण्ठनो वसन्तकः )
विदूषकः—( कर्णं दत्त्वा ) जह अंअं' चित्तसालिआदुवारे पद-
सद्दो सुणीअदि तह तक्केमि आअदा साअरिआत्ति । (ग)
काञ्चनमाला—भट्टिणि ! इअं सा चित्तसालिआ । ता जाब
बसंतअस्स सञ्ञं करोमि¹ । (घ)
( इति छोटिकां ददाति )
विदूषकः—( सहर्षमुपसृत्य सस्मितम् ) सुसंगदे, सरिसो क्खु तुए
किदो कंचणमालाए बेसो ! अध साअरिआ कहिं दाणिं ? (ङ)
काञ्चनमाला—( अङ्गुल्या दर्शयन्ती ) णं एसा । (च)
विदूषकः—( दृष्ट्वा सविस्मयम् ) एसा फुडं ज्जेव्व बासब-
दत्ता ! (छ)
(क) ततः त