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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 235, कुल 286 में से

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पृष्ठ 235

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का लिप्यंतरण है:

२४० रसिकप्रिया
शब्दार्थ—ऐन = ( अयन ) घर । ऐन-सुख = सुख का घर, सुखदायक ।
मैन=( मदन ) काम । कोबिद = चातुर्यपूर्ण ।
इति श्रीमन्महाराजकुमार इंद्रजीतविरचितायां रसिकप्रियायां
सखीजनवर्णनं नाम द्वादशः प्रभावः ॥१२॥
त्रयोदश प्रभाव
अथ सखीजनकर्म-वर्णन—(दोहा)
(४४२) सिक्षा, बिनय, मनाइबो, मिलवै करि सिंगार ।
झुकि अरु देइ उराहनो, यह तिनको ब्योहार ।१।
शब्दार्थ—सिक्षा=सीख । मिलवै = मिलाती है। झुकि = क्रुद्ध होकर ।
राधिका सों शिक्षा-(सवैया)
(४४३) नाह लगें मुख सौति दहैं दुख, नाहिं लगें दुख देह दह्रैगो ।
नाहीं अबै सुख देति है केसव, नाह सदा सुख देत रह्रैगो ।
नाही तें नाही री नाहीं भलाई, भली सब नाह ही तें पै कहैगो ।
नाह सों नेह निबाहि बलाइ ल्यौं; नाहीं सों नेह कहा निबहैगो।२।
भावार्थ—(मानवती नायिका को सखी शिक्षा दे रही है) हे सखी, पति
के मुख लगने पर ( प्रेम करने पर ) दुःख सौतों को जलाता है और यदि
'नहीं' मुख लगेगी तो वही दुख तेरे शरीर को जलाएगा । 'नहीं' केवल इस
समय सुख देती है और पति सदा सुख देता रहेगा । 'नहीं' से भलाई
नहीं है, नहीं है। पति के अनुकूल रहने से ही सब भली कहेंगे । इसलिए मैं
तेरी बलैया लेती हूँ तू नायक से प्रेम का निर्वाह कर, 'नहीं' से भला क्या
प्रेम मिलेगा ।
सूचना—यहाँ देह को केशव ने संस्कृत के अनुकूल पुंलिंग ही रखा है ।
कृष्ण की शिक्षा—( कबित्त )
(४४४) कुंकुम उबटि कुमकुमा के न्हवाइ जल,
सोंधो सिर लाइ याहि लाए कहा रास में ।
चंदन चढ़ाइ फूलमाल पहिराइ भूलि,
वेही काज आँजि मौलि कीनी है प्रकास में ।
१—वर्णन-कथन । मिलवै-मिलिबो, मिलवहि । करि-करहि । सिंगार-
सिंगार । अरु-के । २—राधिका सों-नायिका सों शिक्षा सखी की, राधिका की
शिक्षा प्रकास । दुख देह-मुख देह । तें-री । री-तें । भली-भलो । ही
तें-हिते । बलाइ ल्यों-री बाबरी ।