रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३० ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
कूष्माण्ड ( काशीफल, लालकद्दू ) ककड़ी, कलिंग ( तरबूज ),
करेला, कसुम्भेका शाक, ककोड़ा, कलंबी शाक, काकमाची (मकोह )
का शाक, यह आठ ककारवाले द्रव्य रससेवन करनेवालेको वर्ज देने
चाहिये ॥ ११२ ॥
इति रसशोधनविधिः ॥
अथ उपरस ।
गन्धकं वज्रवैक्रान्तं वज्राभ्रं तालकं शिला ।
खर्परं शिखितुण्डञ्च विमलं हेममाक्षिकम् ॥११३॥
काशीशं कान्तपाषाणं वराटाञ्जनहिङ्गुलम् ।
गैरिकं शङ्खभूनागं टङ्कणञ्च शिलाजतु ।
एते चोपरसाः प्रोक्ताः शोध्या मार्या विधानतः॥११४
गंधक, हीरा, वैक्रांतमणि, वज्राभ्रक, हरिताल, मनसिल, खपरिया,
नीलाथोथा, रूपामक्खी, सोना मक्खी, हीरा कसीस, कांतपाषाण
( चुंबक पत्थर ), वराट ( कौड़ियां ), सुरमा, सिंगरफ, गेरू, शंख, भूनाग
( केंचुआ ), सुहागा और शिलाजीत यह सब उपरस कहे हैं इनको
विधिपूर्वक शोधन और मारण करना चाहिये ॥ ११३ ॥ ११४ ॥
अथ गंधकप्रकरण ।
श्वेतद्वीपे पुरा देव्याः क्रीडन्त्याः प्रसृतं रजः ।
क्षीरार्णवे तु स्नाताया दुकूलं रजसान्वितम् ॥११५॥
धौतं तत्सलिले तस्मिन्गन्धको गन्धवत्स्मृतः ॥
चतुर्धा गन्धकः प्रोक्तो रक्तः पीतोऽसितःसितः॥११६॥
रक्तो हेमक्रियासूक्तः पीतश्चैव रसायने ।
व्रणादिलेपने श्वेतः श्रेष्ठः कृष्णः सुदुर्लभः॥११७॥