रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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गरलस्य तथा ग्राह्यमर्द्धतोलकसम्मितम् ।
त्वगेलापत्रकञ्चैव जातीकोषलवङ्गकम् ॥ ४१ ॥
मांसी तालीशपत्रञ्च माक्षिकञ्च रसाञ्जनम् ।
एषां द्विकार्षिकं भागं देयञ्चापि विचक्षणैः ॥ ४२ ॥
द्रवे किञ्चित्स्थिते चूर्णं मरिचस्य पलं क्षिपेत् ।
भावना च प्रदातव्या पूर्वोक्तेन रसेन च ॥४३॥
निहन्ति विविधान्रोगान्ज्वरान्दाहान्वमिं भ्रमम् ।
तथातिसारकञ्चैव वह्निमान्द्यमरोचकम् ॥
विशेषाद्गार्भिणीरोगं नाशयेदचिरेण च ॥ ४४ ॥
अभ्रक, तांबा, सोना इन सबकी भस्म, गंधक, पारा, मैनशिल,
सुहागा, जवारखार और त्रिफला यह प्रत्येक औषधि चार चार तोले
परिमाण, विष ६ मासे, दालचीनी, इलायची, तेजपात, जावित्री, लौंग,
बालछड़, तालीशपत्र, सोनामाखीभस्म और रसौत यह प्रत्येक औषधि
दो दो कर्ष परिमाण लेवे। इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर गीमेका
शाक और पानोंके रसमें अलग अलग सात सात भावना देवे । जब
कुछ पतला होजावे तब इसमें चार तोले कालीमिरचोंका चूर्ण डालकर
गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे ज्वर, दाह, वमन, भ्रम,
अतिसार, मन्दाग्नि और अरुचिप्रभृति समस्त रोग नष्ट होते हैं तथा
थोड़े ही दिनोंमें गर्भवतीके समस्त रोग दूर हो जाते हैं ॥ ४०-४४ ॥
बृहद्रसशार्दूल रस ।
रसस्य द्विगुणं गन्धं शुद्धं संमर्दयेद्दिनम् ।
प्रतिलौहं सूततुल्यमष्टलौहं मृतं क्षिपेत् ॥ ४५ ॥
ब्राह्मी जयन्ती निर्गुण्डी मधुयष्टिः पुनर्नवा ।
नलिकागिरिकर्ण्यर्ककृष्णधूर्त्तदुरालभाः ॥ ४६ ॥