रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २८ ) रसेंद्रसारसंग्रह ।
लवणवर्ग।
लवणानि च कथ्यन्ते सामुद्रं सैन्धवं विडम् ।
सौवर्चलं रोमकञ्च चुल्लिका लवणं तथा ॥१०४॥
समुद्रनमक, सैंधवनमक, विडनमक, सौवर्चलनमक, रोमकनमक,
चुल्लिकनमक यह लवणवर्ग कहा है ॥ १०४ ॥
मूत्रवर्ग ।
मूत्राणि हस्तिकरभमहिषीखरवाजिनाम् ।
गोजावीनां स्त्रियां पुंसां मूत्रवर्ग उदाहृतः ॥ १०५ ॥
हस्तिमूत्र, उष्ट्रमूत्र,महिषीमूत्र,गर्दभमूत्र, अश्वमूत्र, गोमूत्र,बकरीका
मूत्र, भेड़्का मूत्र, स्त्रीमूत्र, पुरुषमूत्र यह मूत्रवर्ग कहा है ॥ १०५ ॥
द्रावकवर्ग ।
गुञ्जाटङ्कणमध्वाज्यगुडा द्रावकपञ्चकाः ।
सफेद गुंजा (घुंघुची), सुहागा, शहत, घृत, गुड़ ये पांच द्रव्य
द्रावक हैं । इनको पञ्चद्रावक कहते हैं ।
पित्तवर्ग ।
पित्तं पञ्चविधं मत्स्यगवाश्वरुरुबार्हिजम् ॥ १०६ ॥
पित्तभी पांच प्रकारका होता है-मछलीका, गौका, घोड़ेका,
हिरनका और मोरका इनको पित्तपंचक कहते हैं ॥ १०६ ॥
क्षारवर्ग ।
स्वर्जिका टङ्कणं चैव यवक्षार उदाहृतः ॥ १०७ ॥
सज्जीखार, सुहागाखार, यवक्षार इनको क्षारवर्ग कहते हैं ॥१०७॥
रससेवनविधि ।
प्रातरेव पुरतो विरेचनं तद्दिनोपवसनं विधाय च ।
तत्परेऽहनिचपथ्यसेवनंतत्परेऽहिनरसेंद्रसेवनम् १०८