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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 528

( ५०२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह।
गुञ्जाष्टकमिदं तालुगलौष्ठदन्तरोगनुत् ।
महाराष्ट्राश्वगन्धाभ्यां मुखञ्च प्रतिसारयेत् ॥
धारणात्सेवनाच्चैव हन्ति सर्वान्मुखामयान् ॥ ८ ॥
पारा १ भाग, गन्धक १ भाग और शिलाजीत ४ भाग, इन
तीनों औषधियोंको एकत्र गोमूत्रमें पीसकर अदरखके रसमें सात,
मालतीके पत्तोंके रसमें सात, नीमके रसमें सात और महाराष्ट्री
( मरेठी, पनिसिगा, गजपीपल, ) के रसमें सात भावना देकर आठ
आठ रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे मुख-
पाक दूर होता है । पीपलके चूर्ण और सहतके साथ इस औषधिके
सेवन करनेसे दारुण मुखरोग, तालु, गल, ओष्ठ और दन्तसम्बन्धी
समस्त रोग नष्ट होते हैं । महाराष्ट्री और असगन्धके क्वाथसे मुखको
धोकर इस औषधिको मुखमें धारण अथवा सेवन करनेसे सब प्रकारके
मुखरोग नष्ट होते हैं ॥ ६-८ ॥
सर्वास्यामयजित्सेव्यो मधुना पर्पटीरसः ॥ ९ ॥
पित्तपापड़ेके रस और सहतको एकत्र मिलाकर सेवन करनेसे सर्व
प्रकारके मुखरोग नष्ट होते हैं । अथवा पर्पटीरसको २ रत्ती प्रमाण
सहतमें मिलाकर खानेसे मुखरोग नष्ट होता है ॥ ९ ॥
पथ्या बालककुष्ठञ्च गोमूत्रेण प्रसाधयेत् ।
एषा च वटिका हन्ति मुखदौर्गन्ध्यसन्ततिम्॥१०॥
इति रसेन्द्रसारसंग्रहे मुखरोगाधिकारः ।
हरड़, सुगन्धवाला और कूठ इन सब औषधियोंका चूर्ण समान
भाग लेकर अठगुने गोमूत्रमें पकावे । जब पककर खूब गाढा हो
जाय तब यथोचित मात्राकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंके सेवन
करनेसे मुखदौर्गन्ध्यादि समस्त विकार दूर होते हैं ॥ १० ॥
इति मुखरोगाधिकार सम्पूर्ण ।