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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 514

( ४८८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
सेंधेनमकको आकके दूधमें पीसकर श्वित्रके स्थानोंको नखादिसे
खुरचकर इस औषधिका प्रलेप कर देवे । इससे श्वित्र कुष्ठ और कुष्ठ
रोग नष्ट होता है । इसको श्वित्रहर लेप कहते हैं ॥ १०७ ॥
ओष्ठश्वित्रनाशन लेप ।
मुखे श्वेते च संजातेत्विमां कुर्यात्प्रतिक्रियाम् ।
गन्धकं चित्रकाशीशं हरितालं फलत्रयम् ॥
मुखे लिम्पेद्दिनैकेन वर्णनाशो भविष्यति ॥ १०८ ॥
जो मुख अथवा ओष्ठपर श्वित्ररोग उत्पन्न होवे तो उसकी इस
प्रकार चिकित्सा करे । गंधक, चित्रककी जड़, हीराकसीस, हरिताल,
हरड़, बहेड़ा और आमला इन सबको एकत्र चूर्ण बनाकर जलमें
पीसकर मुखपर लेप करे तो मुखके ऊपरके सफेद दाग एक
दिनमें नष्ट हो जाते हैं ॥ १०८ ॥
गुञ्जाफलाग्निचूर्णञ्च लेपनं श्वेतकुष्ठजित् ।
शिलापामार्गभस्मापि लिप्त्वा श्वित्रं विनाशयेत्॥१०९॥
घुंघुचीका चूर्ण और चित्रककी जड़के चूर्णको कुष्ठस्थानपर लेप
करनेसे श्वेतकुष्ठरोग नष्ट होता है । अथवा मैनाशीलके चूर्ण और
चिरचिटेके खार को एकत्र मिलाकर श्वित्रके स्थानोंपर लेप
करनेसे श्वित्रकुष्ठ नष्ट होता है ॥ १०९ ॥
रसमाणिक्य ।
तालकं वंशपत्राख्यं कूष्माण्डसलिले क्षिपेत् ।
सप्तधा वा त्रिधा वापि दधाम्लेन च वा पुनः॥११०॥
शोधयित्वा पुनः शुष्कं चूर्णयेत्तण्डुलाकृति ।
ततः शरावके पात्रे स्थापयेत्कुशलो भिषक् ॥१११॥