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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 509

भाषाटीकासहित । (४८३)
विजयभैरव रस।
सप्तकञ्चुकनिर्मुक्तमूर्द्ध्वलग्नं रसेन्द्रकम् ।
मृत्कटाहान्तरे तत्र स्थापयेच्च समन्त्रकम् ॥ ८३ ॥
सूताद्विगुणितं तालं कूष्माण्डद्रवशोधितम् ।
दोलायन्त्रेण तैलादौ सप्तधा परिशोधितम् ॥ ८४॥
दत्त्वा प्लवैर्द्रवैर्झिण्ट्याः किञ्चिदाप्लाव्य युक्तितः ।
तयोर्द्विगुणितं भस्म पलाशस्योपरि क्षिपेत् ॥८५॥
पुनार्झिण्टीद्रवेणैव सर्वमाप्लाव्य यत्नतः ।
खाखशाकरसैर्भूयः परिप्लाव्य च पाकवित् ॥ ८६ ॥
पचेदवहितो वैद्यः सालाङ्गारेण यत्नतः ।
चतुर्विंशतियामन्तु पक्त्वा शीतलतां नयेत् ॥
अवतार्य काचपात्रे निधाय तदनन्तरम् ॥ ८७ ॥
सप्तकंचुकीरहित पारेको लेकर ऊर्ध्व पातनयंत्रमें पातन करके अघोर
मंत्रको पढ़कर मिट्टीकी हांडीमें स्थापन करे । पश्चात् पेठेका रस, कांजी,
तिलोंका तेल और त्रिफलेके रसके द्वारा दोलायंत्रमें सात बार शुद्ध की
हुई हरिताल पारेसे दुगुनी लेकर उपरोक्त हांडीमें स्थापन करे । फिर
केवटीमोथेका रस और कटसरैयाका रस, हरिताल और पारेके
बीचमें डालकर और उसके ऊपर हरिताल और पारेसे दोगुना ढाकका
खार डालकर फिर दुबारा कटसरैया (पियावांसा) के रस और अफीमके
बीजों ( पोस्त ) के रसमें डुबोकर पाकको जाननेवाला वैद्य चौबीस
प्रहरतक शालकी लकड़ीकी अग्निसे पकावे । शीतल होनेपर चूर्ण
करके कांचकी शीशीमें भरके रख देवे ॥ ८३-८७ ॥
प्रयत्नेन कृतप्रायश्चित्तः शोधितदेहकः ।
सिताहरीतकीयुक्तं खादेद्रक्तिचतुष्टयम् ॥ ८८ ॥