रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ४७५ )
कुष्ठे चास्थिगते चापि शाखानासाविभुग्नके ॥
स्वरभंगे क्षतक्षीणे मण्डलेषु महत्स्वपि ॥४७॥
सीसेकी भस्म ४ मासे, गंधक १ तोला और शुद्ध हरिताल ८ मासे
लेवे, सबको एकत्र करके सोलह गुने गोमूत्रमें तांबेके पात्रमें डाल
मंद मंद अग्निसे पकावे । पश्चात् जम्भीरी नींबूका रस, घीकारका रस
और थूहरकी जड़के रसमें दो दिन तक खरल करके धूपमें सुखावे ।
इसमेंसे चार रत्ती परिमाण औषधि लेकर अस्थिगतकुष्ठ, हस्त, नासा-
भंगरोग, स्वरभंग, क्षतक्षीण और मण्डलकुष्ठमें भांगरेके रसके द्वारा
सेवन करे ॥ ४५-४७ ॥
औदुम्बरं हन्ति शिवामधुभ्यां कृच्छ्रञ्च कुष्ठं
त्रिफलाजलेन । गुडार्द्रकाभ्यां गजचर्मसिध्म-
विचर्चिकास्फोटविसर्पकण्डूम् ॥ ४८ ॥ निह-
न्ति पाण्डुं विविधां विपादीं सरक्तपित्तं कटु-
कासिताभ्याम् । खादेद्विजीरं ह्यमृतायुतञ्च
समुद्गयूषं सघृतञ्च दद्यात् ॥ ४९ ॥
रोहितकजटाक्वाथमनुपानं प्रयच्छति ।
चतुर्दशदिनस्यान्ते कुष्ठं शुष्यति यत्नतः ॥ ५० ॥
क्षुद्बोधो जायतेऽत्यर्थमत्यर्थं सुभगं वपुः ।
वर्जयेत्सततं कुष्ठी मत्स्यमांसादिभोजनम् ॥ ५१ ॥
हरड़ और सहतके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे उदुम्बर-
कुष्ठ, त्रिफलेके क्वाथके साथ इसके सेवन करनेसे कष्टसाध्य कुष्ठरोग,
गुड़ और अदरखके रसके साथ भक्षण करनेसे गजचर्म, सिध्म,
विचर्चिका, विस्फोटक, विसर्प और कण्डू ये रोग नष्ट होते हैं । कुट-
र्कीके चूर्ण और मिश्रीके साथ भक्षण करनेसे पाण्डु, विपादिका और
रक्तपित्तरोग नष्ट होता है । इस औषधिके सेवन करनेके अन्तमें जीरा