रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ४६७ )
द्विनिष्कं भक्षणाद्धन्ति प्रसुतिकुष्ठमण्डलम् ।
पातालगरुडीमूलं जलैः पिष्ट्वा पिबेदनु ॥ ११ ॥
मूर्च्छित पारा १ भाग, गंधक, चित्रककी जड़, बावचीके बीज और
ढाकके बीज यह प्रत्येक द्वादश ( बारह १२ ) भाग और पुराना गुड़
३० भाग, इन सब औषधियोंको एकत्र सहतमें पीसकर आठ
आठ मासेकी गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे ब्रह्म-
हत्यादिजन्य प्रसुतिरोग और मण्डल कुष्ठ नष्ट होते हैं । इस
औषधिके सेवन करनेके बाद पातालगरुडी (छिरहिंटा) की जड़को
जलमें पीसकर सेवन करे । इसको ब्रह्मरस कहते हैं ॥ ९-११ ॥
चन्द्रानन रस ।
सूतव्योमाग्नयस्तुल्यास्त्रिभागो गन्धकस्य च ।
काठोडुम्बरिकाक्षीरैः सर्वमेकत्र मर्दयेत् ॥ १२ ॥
माषमात्रां गुटीं कृत्वा कुष्ठरोगे प्रयोजयेत् ।
देहशुद्धिं पुरा कृत्वा सर्वकुष्ठानि नाशयेत् ॥
एष चन्द्राननो नाम साक्षाच्छ्रीभैरवोदितः ॥ १३ ॥
शुद्ध पारा, अभ्रकभस्म और चित्रक यह प्रत्येक औषधि एक एक
भाग और गन्धक ३ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र कठूमरके
दूधमें पीसकर एक एक मासेकी गोली बना लेवे । प्रथम वमन और
विरेचनके द्वारा शरीरको शुद्ध करके कुष्ठरोगमें इस औषधिका प्रयोग
करे । इससे सब प्रकारके कुष्ठ रोग नष्ट होते हैं । इस चन्द्रानन
रसको श्रीभैरवजीने कहा है ॥ १२ ॥ १३ ॥
कुष्ठकालानल रस ।
गन्धं रसं टङ्कणताम्रलोहं भस्मीकृतं मागधिकासमेतम् ।
पञ्चाङ्गनिम्बेन फलत्रिकेन विभावितं राजतरोस्तथैव ॥
नियोजयेद्वल्लकयुग्ममानं कुष्ठेषु सर्वेषु च रोगसंघे १४॥