सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 49, कुल 584 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 49

भाषाटीकासहित । ( २३ )
विघृष्य वालुकायन्त्रे मूषायां सन्निवेशयेत् ।
दिनमेकं ददेदग्निं मन्दंमन्दं निशावधि ॥ ७७ ॥
एवं निष्पद्यते पीतः शीतः सूतस्तु गृह्यते ।
पर्णखण्डेन तद्गुञ्जां भक्षयेत् श्रूयतां मम ॥ ७८ ॥
क्षुद्बोधं कुरुते पूर्वमुदराणि विनाशयेत् ।
ज्वराणां नाशनः श्रेष्ठस्तद्वच्छ्रीसुखकारकः ॥ ७९ ॥
हृदयोत्साहजननः स्वरूपतनयप्रदः ।
बलप्रदः सदा देहे जरानाशनतत्परः ॥ ८० ॥
अंगभंगादिकं दोषं सर्वं नाशयति क्षणात् ।
एतस्मान्नापरः सूतो रसात्सर्वाङ्गसुन्दरात् ॥ ८१ ॥
शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक दोनों समान भाग लेकर हस्तिशुण्डीके
रसमें और भुईआमलेके रसमें सात २ दिन मर्दन करे, फिर मूषामें
संपुट कर एक बालूकी भरी हांडीमें धरे एक दिन रात्रि मंद मंद
अग्नि देवे इस प्रकार करनेसे पारा पीत वर्णका होजायगा । यह पीत-
भस्म १ रत्ती पानमें रख खानेसे क्षुधाकी वृद्धि होती है एवं जठर
रोगका नाश होता है तथा ज्वर नष्ट होता है सुन्दर कान्ति होय एवं
चित्त प्रसन्न रहे सुन्दर पुत्रोत्पादन करे, बल बढ़े, वृद्धावस्था जाय,
थोड़ेही दिनोंमें अंगभंग आदि दोष नष्ट होते हैं । इस सर्वांगसुंदर
रसके समान श्रेष्ठ और औषधि नहीं है ॥ ७६-८१ ॥
धान्याभ्रकं रसं तुल्यं मारयेन्मारकद्रवैः ।
दिनैकं तेन कल्केन वस्त्रं लिप्त्वा तु वर्त्तिकाम्॥८२॥
विलिप्य तैलैर्वर्त्ति तामेरण्डोत्थैः पुनः पुनः ।
प्रज्वाल्य घृतभाण्डे तद् गृह्णीयात् पतितञ्च यत्८३॥