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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 487, कुल 584 में से

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पृष्ठ 487

भाषाटीकासहित । (४६१)
अथ अर्बुदरोगचिकित्सा ।
रौद्ररस ।
शुद्धसूतं समं गन्धं मर्द्यं यामचतुष्टयम् ।
नागवल्लीरसैर्युक्तं मेघनादपुनर्नवैः ॥ १ ॥
गोमूत्रपिप्पलीयुक्तं मर्द्यं रुध्वा पुटेल्लघु ।
लिह्यात्क्षौद्रे रसो रौद्रो गुञ्जामात्रोऽर्बुदं जयेत् ॥२॥
शुद्ध पारा १ भाग और गन्धक १ भाग, दोनोंको एकत्र पीसकर
चार प्रहरतक पानाके रस, चौलाईके रस, पुनर्नवेके रस, गोमूत्र और
पीपलके क्वाथमें अलग अलग खरल करके मूषामें रखकर लघुपुटमें
पकावे । पश्चात् शीतल होनेपर इसमेंसे एक रत्ती परिमाण औषधि
लेकर सहतमें मिलाकर सेवन करावे । इसके सेवन करनेसे अर्बुदरोग
नष्ट होता है । इसको रौद्ररस कहते हैं ॥ १ ॥ २ ॥
रामबाणादिकान्योगवाहिनोऽत्र प्रयोजयेत् ॥ ३ ॥
इति रसेन्द्रसारसंग्रहे अर्बुदाधिकारः ।
रामबाण प्रभृति समस्त योगवाही औषधि इस अर्बुदरोगमें प्रयुक्त
करनी चाहिये ॥ ३ ॥ इति अर्बुदरोगचिकित्सा समाप्त ।
अथ श्लीपदरोगचिकित्सा ।
नित्यानन्द रस ।
हिंगुलसम्भवं सूतं गन्धकं मृतताम्रकम् ।
वङ्गं तालञ्च तुत्थञ्च शंखं कांस्यं वराटकम् ॥ १ ॥
त्रिकटुत्रिफलालौहं विडङ्गं पटुपञ्चकम् ।
चविका पिप्पलीमूलं हबुषा च वचा तथा ॥ २ ॥
शटी पाठा देवदारु एला च वृद्धदारकम् ।
एतानि समभागानि वटिकां कुरु यत्नतः ॥ ३ ॥
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