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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 477, कुल 584 में से

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पृष्ठ 477

भाषाटीकासहित । ( ४५१ )
रक्तिद्वयक्रमेणैव योज्यं माषद्वयावधि ।
ह्रासयेच्च क्रमेणैव तथा चैव विवर्द्धयेत् ॥ ७३ ॥
काला नमक, पारा और गंधक यह प्रत्येक औषधि दो दो कर्ष
और तांबेकी भस्म ६ कर्ष इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर
जम्भीरी नींबूके रसमें खरल करके हुलहुलके रस, पीपलके क्वाथ
और मोचरसके क्वाथमें मर्दन करे । फिर इसको सूर्यकी तीक्ष्ण धूपमें
सुखाकर फिर जम्भीरी नींबूके रसमें खरल करे । जबतक यह औषधि
अच्छे प्रकारसे जीर्ण न होजाय तबतक मर्दन करे । पश्चात् सूख
जाय तब उत्तम शुभ्र खरलमें पीसकर बारीक चूर्ण कर लेवे । प्रथम
दिन दो रत्ती, दूसरे दिन चार रत्ती, इस प्रकार प्रतिदिन दो दो
रत्ती बढ़ाकर सेवन करे । जब बढ़ते बढ़ते दो मासे पर्यंत होजाय
तब घटाने लगे ॥ ७०-७३ ॥
जीर्णे भुञ्जीत शाल्यन्नं क्षीरं घृतसमन्वितम् ।
हन्त्यम्लपित्तं विविधं ग्रहणीं विषमज्वरम् ॥ ७४ ॥
चिरज्वरं प्लीहगदं यकृद्रोगं सुदुस्तरम् ।
अग्रमांसं तथा शोथं कांस्यक्रोडं सुदुर्जयम् ॥ ७५ ॥
कमठं च तथा शोथमुदरं च सुदारुणम् ।
धातुवृद्धिकरं वृष्यं बलवर्णकरं शुभम् ॥ ७६ ॥
सद्यो वह्निकरं चैव सर्वरोगहरं परम् ।
मुखशुद्धिर्विधातव्या पर्णैश्चूर्णसमन्वितैः ॥
ताम्रकल्पमिदं नाम्ना सर्वरोगप्रशान्तये ॥ ७७ ॥
इस औषधिके सेवन करनेके अंतमें औषधिके जीर्ण होनेपर शालि
चावलोंका भात, दूध और घृत भक्षण करे । इस औषधिके सेवन
करनेसे विविध प्रकारका अम्लपित्त, संग्रहणी, विषमज्वर, चिरज्वर,
प्लीहा, यकृत्, अग्रमांस, शोथ, कांस्यक्रोड, कमठ, शोथ और