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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 462, कुल 584 में से

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पृष्ठ 462

( ४३६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
पारा ४ भाग, गंधक ८ भाग, हलदी, हरड़, बहेड़ा, आमला और
मैनशिल यह प्रत्येक औषधि तीन तीन भाग लेवे । दंतीकी जड़,
सोंठ, मिरच, पीपल और जीरा यह प्रत्येक औषधि आठ आठ भाग
लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर चूर्ण कर लेवे । पश्चात् इस
चूर्णको जयंतीके पत्तोंके रसमें, थूहरके दूध, भांगरेके रस, चित्रककी
जड़के रस और एरंडीके तेलमें अलग अलग सात सात भावना देवे ।
इस औषधिमेंसे चार मासे औषधि लेकर गरम जलके साथ सेवन
करे । इसके सेवन करनेसे जब अच्छे प्रकारसे दस्त होजायँ तब
दिनके अंतमें गरम तक्र और सेंधानमक मिलाकर पथ्य देवे । और
शीतल जल त्याग करा देवे । इससे सर्व प्रकारके उदररोग और
मूढवात नष्ट होते हैं । इसको महावह्नि रस कहते हैं ॥ २१–२४ ॥
इच्छाभेदी रस ।
शुण्ठीमरिचसंयुक्तं रसगन्धकटङ्कणम् ।
जैपालो द्विगुणः प्रोक्तः सर्वमेकत्र चूर्णयेत् ॥ २५ ॥
इच्छाभेदी द्विगुञ्जः स्यात्सितया सह दापयेत् ।
पिबेत्तु चुल्लुकान्यावत्तावद्वारान्विरेचयेत् ॥ २६ ॥
सोंठ, मरिच, पारा, गंधक और सुहागा यह प्रत्येक औषधि
एक एक भाग लेवे, जमालगोटे २ भाग लेवे, इन सब औषधियोंको
एकत्र करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । मिश्रीके साथ इस
औषधिका सेवन करे, इसके ऊपर जितने वार उड़दोंके धोवनका जल
पान करे उतने ही वार विरेचन होता है । इसको इच्छाभेदी रस
कहते हैं ॥ २५ ॥ २६ ॥
पिप्पलीमूलाद्य लोह ।
पिप्पलीमूलचित्राभ्रत्रिकत्रयेन्दुसैन्धवम् ।
सर्वचूर्णसमं लोहं हन्ति सर्वोदरामयम् ॥ २७ ॥