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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 46

( २० ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
भावनात्रितयं दत्त्वा स्थालीमध्ये निधापयेत् ।
विरच्य कवचीयन्त्रं वालुकाभिः प्रपूरयेत् ॥६६॥
दद्यात्तदनु मन्दाग्निं भिषग्यामचतुष्टयम् ।
जायते रससिन्दूरं तरुणादित्यसन्निभम् ॥
अनुपानविशेषेण करोति विविधान् गुणान् ॥६७॥
अन्य प्रकार-शुद्ध पारा ४ तोले, शुद्ध गंधक ४ तोले इन दोनोंको
विधिवत् खरल कर कजली बनावे फिर इसमें वटवृक्षके अंकुरोंके रसकी
तीन भावना देवे । सूखनेपर अग्निसहनशीला शीशीमें भरकर उस
शीशीपर सात वार कपड़मिट्टी करके सुखाले फिर वालुका यंत्रमें
रखकर चार पहरकी मंदाग्नि देवे तो प्रातःकालके सूर्य समान वर्णवाला
रससिंदूर होजाता है । इसको अनुपान विशेषसे प्रयोग करे तो अनेक
रोगोंको दूर करता है ( इसमें मन्द-मध्य-तीक्ष्ण क्रमसे कमसे कम
बारह पहरतक तो आंच अवश्य दी जानी चाहिये । थोड़ीमें पाक
असंभव हैं ) ॥ ६६-६७ ॥
पृथक् समंसमं कृत्वा पारदं गन्धकं तथा ।
नवसारं धूमसारं स्फटिकं याममात्रकम् ॥ ६८ ॥
निम्बूरसेन संमर्द्य काचकूप्यां निवेशयेत् ।
मुखे पाषाणखटिकां दत्त्वा मुद्रां प्रलेपयेत् ॥ ६९ ॥
सप्तभिर्मृत्तिकावस्त्रैः पृथक् संशोध्य वेष्टयेत् ।
सच्छिद्रायां मृदः स्थाल्यां कूपिकां तां निवेशयेत् ७०.
पूरयेत्सिकतापूरैरागल मतिमान् भिषक् ।
निवेश्य चुल्ल्यां दहनं मन्दं मध्यं खरं क्रमात् ॥ ७१ ॥
प्रज्वाल्य द्वादशं यामं स्वांगशीतं समुद्धरेत् ।