रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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अथ स्थौल्याधिकार ।
त्र्यूषणाद्यलोह ।
त्र्यूषणं विजया चव्यं चित्रकं विडमौद्भिदम् ।
वागुजी सैन्धवञ्चैव सौवर्चलसमन्वितम् ॥ १ ॥
अयश्चूर्णेन संयुक्तं भक्षयेन्मधुसर्पिषा ।
स्थौल्यापकर्षणं श्रेष्ठं बलवर्णाग्निवर्द्धनम् ॥ २ ॥
मेहघ्नं कुष्ठशमनं सर्वव्याधिहरं परम् ।
नाहारे यन्त्रणा कार्या न विहारे तथैव च ॥
त्र्यूषणाद्यमिदं लौहं रसायनवरोत्तमम् ॥ ३ ॥
त्रिकुटा, भांग, चव्य, चित्रककी जड़, विडनमक, औद्भिदलवण,
बावचीके बीज, सेंधानमक और कालानमक यह सब औषधि समान
भाग लेवे और सबकी बराबर लोहभस्म लेवे । इन सब औषधियोंको
एकत्र पीसकर घृत और सहतमें मिलाकर सेवन करनेसे मेदरोग नष्ट
होता है । बल, वर्ण और अग्निकी वृद्धि होती है । प्रमेह, कुष्ठ और
समस्त रोग नष्ट होते हैं । इस औषधिके सेवन करनेपर यथेष्ट आहार
विहार करे ॥ १-३ ॥
वडवाग्निलोह ।
सूतभस्म सतालञ्च लौहं ताम्रं समं समम् ।
मर्दयेत्सूर्यपत्रेण चास्य वल्लं प्रयोजयेत् ॥ ४ ॥
मधुना स्थूलरोगे च शोथे शूले तथैव च ।
मध्वाज्यमनुपानञ्च देयं वापि कफोल्वणे ॥ ५ ॥
रससिन्दूर, हरितालभस्म, लोहाभस्म और तांबाभस्म यह सब
औषधि समान भाग लेकर आकके पत्तोंके रसमें खरल करके दो दो
रत्तीकी गोली बना लेवे । मेदरोग, शोथ और शूलरोगमें इस औषधिको