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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 450, कुल 584 में से

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पृष्ठ 450

( ४२४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
कुमारी केवला देया चेषल्लवणसंयुता ।
प्रमेहं हन्ति सकलं सप्ताहात्परतो नृणाम् ॥ ४८ ॥
अथवा केवल एक घीकारके रसमें किंचित् नमक मिलाकर सेवन
करनेसे एक सप्ताहमें सब प्रकारका प्रमेह रोग दूर होता है ॥ ४८ ॥
मेहकेशरी ।
मृतवङ्गं सुवर्णञ्च कान्तलौहञ्च पारदम् ।
मुक्ता गुडत्वचञ्चैव सूक्ष्मैलापत्रकेशरम् ॥ ४९ ॥
समभागं विचूर्ण्याथ कन्यानीरेण भावयेत् ।
द्विमाषां वटिकां खादेद्दुग्धान्नं प्रपिबेत्ततः ॥ ५० ॥
प्रमेहं नाशयत्याशु केसरी करिणं यथा ।
शुक्रप्रवाहं शमयेत्त्रिरात्रान्नात्र संशयः ॥
चिरजातं प्रवाहञ्च मधुमेहञ्च नाशयेत् ॥ ५१ ॥
वंगभस्म, सोनाभस्म, कान्तलोहभस्म, रससिन्दूर, मोती, दाल-
चीनी, छोटी इलायची, तेजपात और नागकेशर इन सब औषधियोंको
समान भाग लेकर घीकारके रसमें सात भावना देकर दो दो मासेकी
गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेपर दूधके साथ भात
खावे । जिस प्रकार सिंह हस्तियोंके समूहको नष्ट करता है उसी प्रकार
यह औषधि भी प्रमेहके समूहको नष्ट करती है । इसके सेवन करनेसे
तीन दिनमें शुक्रका बहना बंद हो जाता है तथा बहुत दिनोंका प्रमेह
और मधुमेह नष्ट होता है । इसको मेहकेशरी रस कहते हैं ॥४९-५१
योगेश्वर रस ।
सूतकं गन्धकं लौहं नागञ्चापि वराटिकाम् ।
ताम्रकं वंगभस्मापि व्योमकञ्च समांशकम् ॥ ५२ ॥
सूक्ष्मैलापत्रमुस्तञ्च विडङ्गं नागकेशरम् ।
रेणुकामलकञ्चैव पिप्पलीमूलमेव च ॥ ५३ ॥