सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 443, कुल 584 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 443

भाषाटीकासहित । ( ४१७ )
सात भावना देकर गोलियां बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे
बीस प्रकारके प्रमेह रोग नष्ट होते हैं । यह बृहत् हरिशंकर रस
गहनानन्दने कहा है ॥ ९ ।। १० ॥
आनन्दभैरव रस ।
वङ्गभस्म मृतं स्वर्णं रसं क्षौद्रैर्विमर्दयेत् ।
द्विगुञ्जं भक्षयेन्नित्यं हन्ति मेहं चिरोद्भवम् ।
गुञ्जामूलं तथा क्षौद्रैरनुपानं प्रशस्यते ॥ ११ ॥
वंगभस्म, सोनाभस्म और रससिन्दूर इन तीनों औषधियोंको
समान भाग लेकर सहतमें मिलाकर दो रत्ती परिमाण नित्य खावे ।
इससे बहुत दिनोंका पुराना प्रमेह नष्ट होजाता है। इस औषधिके
सेवन करनेके पश्चात् गुंजाकी जड़को सहतमें मिलाकर भक्षण करे ।
इसको आनन्दभैरव रस कहते हैं ॥ ११ ॥
विद्यावागीश रस ।
मृतसूताभ्रनागञ्च स्वर्णं तुल्यं प्रकल्पयेत् ।
महानिम्बस्य चूर्णं तु चतुर्भिः सममाहरेत् ॥ १२ ॥
मधुना लेहयेन्माषं लालामेहप्रशान्तये ।
सक्षौद्रं रजनीचूर्णं लेह्यं निष्कद्वयं तथा ॥
असाध्यं नाशयेन्मेहं विद्यावागीशको रसः ॥ १३ ॥
रससिन्दूर, अभ्रकभस्म, सीसाभस्म और सोनाभस्म यह प्रत्येक
औषधि एक एक भाग, बकायनका चूर्ण ४ भाग इन सब औषधि-
योंको एकत्र करके एक मासे सहतके साथ सेवन करनेसे लालामेह
नष्ट होता है। इस औषधिके भक्षण करनेके पश्चात् छः मासे हल्दीके
चूर्णको सहतमें मिलाकर चाटे । इसके सेवन करनेसे असाध्य प्रमेहरोग
भी नष्ट हो जाता है । इसको विद्यावागीश रस कहते हैं ॥१२॥१३॥