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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 441, कुल 584 में से

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पृष्ठ 441

भाषाटीकासहित । ( ४१६ )
लेवे इस औषधिके सेवन करनेसे सर्व प्रकारका प्रमेह रोग नष्ट होता
है । इसको हरिशंकर रस कहते हैं ॥ १ ॥
इन्द्रवटी ।
मृतं सूतं मृतं वङ्ग-मर्जुनस्य त्वचान्वितम् ।
तुल्यांशं मर्दयेत्खल्ले शाल्मल्या मूलजैर्द्रवैः ॥ २ ॥
दिनान्ते वटिका कार्या माषमात्रा प्रमेहहा ।
एषा इन्द्रवटी नाम्ना मधुमेहप्रशान्तिकृत् ॥ ३ ॥
रससिन्दूर, वंगभस्म और अर्जुनवृक्षकी छाल समान भाग लेकर
सेमलकी जड़के रसमें एक दिनतक खरल करके एक एक मासेकी
गोली बना लेवे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे सब प्रकारका प्रमेह
और मधुमेह नष्ट होता है ॥ २ ॥ ३ ॥
वङ्गावलेह ।
वंगभस्म द्विवल्लञ्च लेहयेन्मधुना सह ।
ततो गुडसमं गन्धं भक्षयेत्कर्षमात्रकम् ॥ ४ ॥
गुडूचीसत्त्वमथवा शर्करासहितं तथा ।
सर्वमेहहरो ज्ञेयो वङ्गावलेह उत्तमः ॥ ५ ॥
चार रत्ती परिमाण वंगकी भस्मको सहतमें मिलाकर चाटे और
ऊपरसे एक कर्ष परिमाण गुड़ और गंधक भक्षण करे । अथवा एक
तोला गिलोयका सत और मिश्री दोनोंको एकत्र मिलाकर भक्षण
करे । इसके सेवन करनेसे सब प्रकारका प्रमेहरोग दूर होता है ।
इसको वंगावलेह कहते हैं ॥ ४ ॥ ५ ॥
प्रमेहसेतु ।
सूताभ्रञ्च वटक्षीरैर्मर्दयेत्प्रहरद्वयम् ।
विशोष्य पक्वमूषायां सर्वरोगे प्रयोजयेत् ॥ ६ ॥