रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४१२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
सेंधानमक, कांजी और त्रिफलेका चूर्ण इन सब औषधियोंको
एकत्र पीसकर घृतके साथ सेवन करनेसे त्रयोदश प्रकारका मूत्रा-
घातरोग दूर होता है ॥ ७ ॥
पक्वमिर्वारुबीजानामक्षमात्रं ससैन्धवम् ।
धान्याम्लयुक्तं पीत्वैव मूत्राघाताद्विमुच्यते ॥ ८ ॥
पकी हुई ककड़ीके बीजोंको ( अथवा खीरेके बीजोंको ) एक तोला
परिमाण लेकर सेंधानमक और कांजीके साथ सेवन करनेसे मूत्राघात
रोग नष्ट होता है ॥ ८ ॥
गोखरुआदि योग ।
त्रिकण्टकैरण्डशतावरीभिः सिद्धं पयो वा तृण-
पञ्चमूलैः । गुडप्रगाढं सघृतं पयो वा रोगेषु
कृच्छ्रादिषु शस्तमेतत् ॥ ९ ॥
गोखरू, एरंडकी जड़ और सतावर इन तीनों औषधियोंको समान
भाग लेकर एकत्र पीसकर दूधमें पकाकर उस दूधको पान करे ।
अथवा तृणपंचमूल ( कुशा, काँस, रामसर, डाभ और ईख ) के
द्वारा सिद्ध किये हुए दूधको या गुड़सहित घी मिले हुए दूधको
इस मूत्रकृच्छ्र और मूत्राघात रोगमें प्रयोग करना चाहिये ॥ ९ ॥
इति मूत्राघातरोगचिकित्सा ।
अथ अश्मरीरोगचिकित्सा ।
पाषाणवज्र रस ।
शुद्धसूतं द्विधा गन्धं रसैः श्वेतपुनर्नवैः ।
मर्दयित्वा दिनं खल्ले रुद्ध्वा तद्भूधरे पचेत् ॥ १ ॥
दिनान्ते तत्समुद्धृत्य मर्दयेद् गुडसंयुतम् ।
अश्मरीं बस्तिशूलञ्च हन्ति पाषाणवज्रकः ॥ २ ॥