रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४१० ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
तुलसीतिलपिण्याकं बिल्वमूलं तुषाम्बुना ॥
कर्षैकं वानुपानेन सुरया वा सुवर्चलैः ॥ १२ ॥
इति रसेन्द्रसारसंग्रहे मूत्रकृच्छ्राधिकारः ।
रससिन्दूर और हरिताल इन दोनोंको समान भाग लेकर सतावरके
रसमें खरल करके पश्चात् उसमें रससिन्दूरकी बराबर तूतिया मिला-
कर एक दिनतक खरल करके गोला बना लेवे । पश्चात् इस गोलेको
सरसोंके तेलमें एक प्रहरतक पकाकर चूर्ण कर लेवे । सहतके साथ
इस औषधिको चार रत्ती परिमाण लेकर सेवन करे तो मूत्रकृच्छ्र रोग
दूर हो जाता है । इस औषधिके सेवन करनेके अन्तमें तुलसीके पत्ते,
तिलकी खली और बेलकी जड़ इन सब औषधियोंको समान भाग
लेकर पीसकर कांजीमें मिलाकर एक कर्ष परिमाण सेवन करे ।
अथवा काले नमकको मदिराके साथ सेवन करे । इसको मूत्रकृच्छा-
न्तक रस कहते हैं ॥ १०–१२ ॥ इति मूत्रकृच्छ्ररोगाधिकार सम्पूर्ण ।
अथ मूत्राघाताधिकार ।
तारकेश्वर रस ।
मृतसूताभ्रगन्धं च मर्दयेन्मधुना दिनम् ।
तारकेश्वरनामायं गहनानन्दभाषितः ॥ १ ॥
माषमात्रं भजेत्क्षौद्रैर्बहुमूत्रप्रशान्तये ।
उदुम्बरफलं पक्वं चूर्णितं कर्षमात्रकम् ॥
संलिह्यान्मधुना सार्द्धमनुपानं सुखावहम् ॥ २ ॥
रससिन्दूर, अभ्रकभस्म और गन्धक इन तीनों औषधियोंको
समान भाग लेकर सहतमें एक दिनतक खरल करके एक मासे
परिमाण औषधि सहतमें मिलाकर सेवन करनेसे मूत्राघातरोग दूर
होता है । इस औषधिके सेवन करनेके अन्तमें पक्व गूलरको पीसकर
एक तोला सहतमें मिलाकर भक्षण करे ॥ १ ॥ २ ॥