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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 434

( ४०८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
प्रातःकाले शीतपानीयपानान्मूत्रे जाते स्यात्सुखी
च क्रमेण ॥ २ ॥
वंगभस्म, पारा और गंधक इन तीनों औषधियोंको समान भाग
लेकर लोहेके पात्रमें दूर्वा, मुलैठी, गोखरू और सेमलकी जड़के रसमें
अलग अलग खरल करके मूषामें रखकर भूधरयंत्रमें पकावे । पश्चात्
उपरोक्त दूब आदिके रसमें सात सात भावना देकर दो दो रत्तीकी
गोली बना लेवे । पश्चात् दूब,मुलैठी और सेमलकी जड़का काथ और
दूध यह प्रत्येक औषधि समान भाग लेकर खीर बनाकर औषधि
सेवन करनेके पश्चात् सेवन करे और प्रातःकाल शीतल जलको पीवे ।
इसके सेवन करनेसे अच्छे प्रकारसे खुलकर साफ पेशाब होता है
और रोगी अच्छे प्रकारसे चलने फिरनेको समर्थ होता है । इसको
त्रिनेत्राख्य रस कहते हैं ॥ १ ॥ २ ॥
वरुणाद्य लौह ।
द्विपलं वरुणं धात्र्यास्तदर्द्धं धातृपुष्पकम् ।
हरीतक्याः पलार्द्धञ्च पृश्निपर्णी तदर्द्धकम् ॥ ३ ॥
कर्षमानञ्च लौहाभ्रं चूर्णमेकत्र कारयेत् ।
भक्षयेत्प्रातरुत्थाय शाणमानं विधानवित् ॥ ४ ॥
मूत्राघातं तथा घोरं मूत्रकृच्छ्रञ्च दारुणम् ।
अश्मरीं विनिहंत्याशु प्रमेहं विषमज्वरम् ॥ ५ ॥
बलपुष्टिकरञ्चैव वृष्यमायुष्यमेव च ।
वरुणाद्यमिदं लौहं चरकेण विनिर्मितम् ॥ ६ ॥
बरनेकी छाल २ पल, आमले २ पल, धायके फूल १ पल,
हरड़ २ तोले, पृश्निपर्णी, लोहाभस्म और अभ्रकभस्म यह प्रत्येक
औषधि एक कर्ष परिमाण लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र
खरल करके प्रतिदिन प्रातःकाल चार मासे परिमाण भक्षण करे । इस