रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४०२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
स्नुहीक्षीरैर्वटी कार्या यथा स्विन्नकलायवत् ।
वटीद्वयं शिवामेकां पिष्ट्वा चोष्णाम्बुना पिबेत् २३॥
उष्णाद्विरेचयेदेषा शीते स्वास्थ्यमुपैति च ।
जीर्णज्वरं पाण्डुरोगं प्लीहाष्ठीलोदराणि च ॥
रक्तपित्ताम्लपित्तादिसर्वाजीर्णं विनाशयेत् ॥ २४ ॥
हरड़, कालीमिरच, पीपल और सुहागा यह प्रत्येक औषधि एक
एक भाग लेवे और जमालगोटे ४ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको
एकत्र पीसकर थूहरके दूधमें खरल करके सीजे हुए मटरके दानेकी
बराबर गोली बना लेवे । इन गोलियोंमेंसे दो गोली और एक हरड़को
एकत्र पीसकर गरम जलके साथ सेवन करे । इस औषधिका सेवन
करके उष्ण क्रिया आचरण करे तो दस्त बराबर होते रहते हैं
और शीतल क्रिया व्यवहार करनेसे दस्त बंद होजाते हैं । इस औष-
धिके सेवन करनेसे जीर्णज्वर, पांडुरोग, प्लीहा, अष्ठीला, उदररोग,
रक्तपित्त, अम्लपित्त और सर्व प्रकारके अजीर्णरोग नष्ट होते हैं ।
इसको अभयावटी कहते हैं ॥ २३-२४ ॥
गोपीजल ।
जैपालाष्टौ द्विको गन्धं शुण्ठी मरिचचित्रकम् ।
एकः सूतः ससौभाग्यो गोपीजल इति स्मृतः २५॥
शूलव्याध्याश्रयान्गुल्मान्कोष्ठादौ दश पैत्तिकान् ।
भगन्दरादिहृद्रोगान्नाशयेदेव भक्षणात् ॥ २६ ॥
जमालगोटे ८ भाग, गंधक २ भाग, सोंठ, मिरच, चित्रककी जड़,
पारा और सुहागा यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे । इन सब
औषधियोंको एकत्र पीसकर यथोचित मात्रानुसार सेवन करनेसे
शूलाश्रित गुल्म, भगन्दर और हृदयरोग नष्ट होते हैं । इसको
गोपीजल कहते हैं ॥ २५ ॥ २६ ॥