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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 422, कुल 584 में से

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पृष्ठ 422

( ३९६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
पत्तोंके रस और नोनियाके पत्तोंके रसमें खरल करके गोली बना
लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे उदर, गुल्म, पांडु, क्रिमि, कुष्ठ,
गात्रकण्डू और पिड़िकारोग प्रभृति नष्ट होते हैं। इस वैद्यनाथवटीको
स्वयं महादेवने कहा है ॥ १ ॥ २ ॥
बृहदिच्छाभेदी रस ।
शुद्धं पारदटंकणं समरिचं गन्धाश्मतुल्यं त्रिवृद्,
विश्वा च द्विगुणा ततो नवगुणं जैपालचूर्णं क्षिपेत् ।
खल्वे दण्डयुगं विमर्द्य विधिना चार्कस्य पत्रे ततः,
स्वेदं गोमयवह्निना च मृदुना स्वेच्छावशाद्भेदकः॥३॥
गुञ्जैकप्रमितो रसो हिमजलैः संसेवितो रेचये-
द्यावन्नोष्णजलं पिबेदपि वरं पथ्यञ्च. दध्योदनम् ।
आमं सर्वभवं सुजीर्णमुदरं गुल्मं विशालं हरे-
द्देहदीप्तिकरो बलासहरणः सर्वामयध्वंसनः ॥ ४ ॥
शुद्ध पारा, सुहागा, काली मिरच, गन्धक और निसोथकी जड़,
यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे, सोंठ २ भाग लेवे और
जमालगोटेका चूर्ण नव ९ भाग, इन सब औषधियोंको दो दण्ड
( एक दण्डके २४ मिनट ) पर्यन्त मर्दन करके आकके पत्तोंमें लपेट
मूषामें रखकर जंगली उपलोंकी अग्निसे धीरे २ पकावे । जब अपने
आप शीतल होजाय तब एकत्र पीसकर बारीक चूर्ण कर ले । इसमेंसे
एक रत्ती परिमाण औषधि लेकर शीतल जलके साथ सेवन करे ।
इसके सेवन करनेपर जबतक गरम जल नहीं पीवे तबतक बराबर
दस्त होते रहते हैं । इस औषधिको भक्षण करके ऊपरसे दहीके
साथ भात खावे । इस औषधिके सेवन करनेसे आमदोष, त्रिदोषज
उदररोग और गुल्मरोग नष्ट होते हैं। यह अत्यंत अग्निप्रदीपक,
कफनाशक और सर्व रोगोंका हरनेवाला है । इसको बृहत्-
इच्छाभेदी रस कहते हैं ॥ ३ ॥ ४ ॥