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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 420, कुल 584 में से

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पृष्ठ 420

( ३९४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
हींग इनको समान भाग लेकर सहत और घृतमें मिलाकर इस औष-
धिके ऊपरसे भक्षण करे । इससे एक प्रहरमें परिणामशूल नष्ट होता
है । इसको त्रिगुणाख्य रस कहते हैं ॥ ५९ ॥ ६० ॥
शूलहरणयोग ।
हरीतकी त्रिकटुकं कुचिला हिंगुसैन्धवम् ।
गन्धकञ्च समं सर्वं वटीं कुर्यात्सुखावहाम् ॥ ६१ ॥
लघुकोलप्रमाणान्तु शस्यते प्रातरेव हि ।
एकैका वटिका ग्राह्या गुल्मशूलविनाशिनी ॥ ६२ ॥
ग्रहण्यामतिसारे च सजीर्णे मन्दपावके ।
योजयेदुष्णपयसा सुखमाप्नोति निश्चितम् ॥
सुवर्णञ्च भवेद्देहं सदोत्साहयुतं नृणाम् ॥ ६३ ॥
हरड़, त्रिकुटा, कुचला, हींग, सेंधानमक और गंधक यह सब
औषधि समान भाग लेकर जलमें पीसकर गोली बना लेवे । यह
गोली छोटे बेरकी बराबर बनानी चाहिये । गुल्म और शूलरोग नष्ट
करनेवाली यह गोली प्रतिदिन प्रातःकाल एक एक गोली खाये ।
ग्रहणी, अतिसार, अजीर्ण और मंदाग्नि प्रभृति रोगोंमें इसको गरम
जलके साथ सेवन करे तो अवश्य आरोग्यता प्राप्त होती है । इसके
सेवन करनेसे शरीरमें सुवर्णकी समान कांति उत्पन्न होती है ।
बल और उत्साहकी वृद्धि होती है । इसको शूलहरण योग
कहते हैं ॥ ६१-६३ ॥
शर्करालोह ।
त्रिफलायास्तथा धात्र्याश्चूर्णं वा काललौहजम् ।
शर्कराचूर्णसंयुक्तं सर्वशूलेषु योजयेत् ॥ ६४ ॥
त्रिफलेका चूर्ण ३ भाग, आमलेका चूर्ण १ भाग, मिश्री १ भाग और
लोहेका चूर्ण ५ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर सर्व-
प्रकारके शूलरोगोंमें प्रयोग करे । इसको शर्करालोह कहते हैं ॥ ६४ ॥