रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
पृष्ठ 37, कुल 584 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । (११)
रसोनस्वरसैः सूतो नागवल्लीदलोत्थितैः ।
त्रिफलायास्तथा क्वाथै रसो मर्द्यः प्रयत्नतः ॥३६॥
ततस्तेभ्यः पृथक् कृत्वा सूतं प्रक्षाल्य काञ्जिकैः ।
सर्वदोषविनिर्मुक्तं योजयेद्रसकर्मसु ॥ ३७ ॥
अथवा-पारेको रसोन ( लहसुन ) के स्वरसमें खरल करे फिर नागर-
वेलके पानके रसमें खरल करे, तदनंतर त्रिफलेके क्वाथमें यत्नपूर्वक
खरल करे । फिर इनसे पारेको अलग कर कांजीसे धो डाले तो पारा
सर्व दोषरहित और सब काममें लाने योग्य होजाता है ॥३६॥ ३७ ॥
अथोर्ध्वपातनसंस्कार ।
भागास्त्रयो रसस्यार्कभागमेकं विमर्दयेत् ।
जंबीरद्रवयोगेन यावदायाति पिण्डताम् ॥ ३८ ॥
तत्पिण्डं तलभाण्डस्थमूर्ध्वभाण्डे जलं क्षिपेत् ।
कृत्वालवालं केनापि ततः सूतं समुद्धरेत् ॥
ऊर्ध्वपातनमित्युक्तं भिषग्भिः सूतशोधने ॥ ३९ ॥
पारा ३ भाग, शुद्ध ताम्रके छोटे बारीक पत्र १ भाग इन
दोनोंको जंबीरी नींबूके रसमें तबतक खरल करे जबतक पारे
और तांबेका पिंडसा न बन जावे । जब पिण्डसा बन जाय तो
उसको एक मिट्टीके घट ( चाटीके ) अन्दर टिकियासी बनाकर
रख दे, दूसरा उतना ही बडा घट लेकर उस पात्रके मुखपर अधो-
मुख रखकर दोनों घटोंका मुख गजनी ( मुलतानी ) मट्टी और
कपडेसे विधिवत् संधान कर देवे फिर इसको चूल्हेपर चढाकर नीचे
क्रमसे अग्नि जलावे । ऊपरके अधोमुख घटके ऊपर चिकनी
मट्टीसे घेरासा बनाकर उसमें शीतल जलसे भिगोकर कपडा रखता
रहे जिससे अधोमुख घटका तलभाग ( थल्ला ) गरम न होने पावे
इसको दो पहरकी अग्नि देकर फिर शीतल होनेपर उतार कर