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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 303, कुल 584 में से

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पृष्ठ 303

भाषाटीकासहित । ( २७७ )
रक्तपित्ते पिबेद्व्योमसहितं पर्पटीरसम् ।
वासाद्राक्षाभयानाञ्च क्वाथं वा शर्करान्वितम् ॥
योगवाहिरसान्सर्वान् रक्तपित्ते प्रयोजयेत् ॥ ७ ॥
रक्तपित्तरोगमें पित्तपापड़ेके रसके साथ अभ्रककी भस्मको; अथवा
अडूसा, दाख और हरड़ इनके क्वाथमें मिश्री डालकर पीवे; अथवा
समस्त योगवाही औषधि प्रयुक्त करे ॥ ७ ॥
रक्तपित्तान्तक रस ।
मृताभ्रं मुण्डतीक्ष्णञ्च माक्षिकं रसतालकम् ।
गन्धकञ्च भवेत्तुल्यं यष्टिद्राक्षामृताद्रवैः ॥ ८ ॥
दिनैकं मर्दयेत्खल्ले सिताक्षौद्रसमन्वितम् ।
माषमात्रं निहन्त्याशु रक्तपित्तं सुदारुणम् ॥
ज्वरं दाहं क्षतक्षीणं तृष्णां शोषमरोचकम् ॥ ९ ॥
अभ्रकभस्म, लोहभस्म, मुण्डलोहभस्म, सोनामाखीभस्म, पारा-
भस्म, हरितालभस्म और गंधक यह प्रत्येक औषधि समान भाग
लेकर मुलहठी, दाख और गिलोय इनके क्वाथमें अलग अलग एक
एक दिन पर्यंत खरल करे । इस औषधिको एक मासे परिमाण मिश्री
और शहदमें मिलाकर खानेसे शीघ्र ही दारुण रक्तपित्त, ज्वर, दाह,
क्षतक्षीण, तृषा, शोष और अरुचि रोग नष्ट होते हैं । इसको रक्त-
पित्तान्तक रस कहते हैं ॥ ८ ॥ ९ ॥
रसामृत रस ।
रसस्य द्विगुणं गन्धं माक्षिकञ्च शिलाजतु ।
गुडूची चन्दनं द्राक्षा मधुपुष्पञ्च धान्यकम् ॥ १० ॥
कुटजस्य त्वचं बीजं धातकी निम्बपत्रकम् ।
यष्टीमधुसमायुक्तं मधुशर्करयाऽन्वितम् ॥ ११ ॥