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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 300

( २७४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
तान्सर्वानाशयेदाशु बलवर्णाभिवर्द्धनः ।
सम्मोहलोहनामायं पाण्डुरोगे च पूजितः ॥ ५० ॥
त्रिकुटा, त्रिफला, चित्रक, वायविडङ्ग, लोहभस्म, अभ्रकभस्म यह
सब समान भाग लेकर घृतमें गोलियां बनावे । यह रस सेवन करनेसे
कामला, पाण्डुरोग, हृद्रोग, शोथ, भगन्दर, कोष्ठगतक्रिमि, मन्दाग्नि,
अरुचि इन सब रोगोंको शीघ्र नष्ट करता है और बल, वर्ण
और अग्निको बढ़ानेवाला है; पाण्डुरोगके लिये अत्यन्त श्रेष्ठ है ।
इसको सम्मोह लोह कहते हैं ॥ ४८-५० ॥
त्र्यूषणादि मण्डूर ।
स्विन्नमष्टगुणे मूत्रे लौहकिट्टं सुशोधितम् ।
पाकान्ते त्र्यूषणं वह्निवरादार्वीसुरद्रुमान् ॥ ५१ ॥
विडंगबीजचूर्णञ्च मुस्तं किट्टसमं क्षिपेत् ।
प्रातःकर्षं भजेदस्य जीर्णे तक्रौदनं भजेत् ॥ ५२ ॥
हलीमकं पाण्डुरोगमर्शांसि श्वयथुं तथा ।
ऊरुस्तम्भं जयेदेतत्कामलां कुम्भकामलाम् ॥५३॥
शुद्ध मण्डूरको आठ गुणे गोमूत्रमें पकाकर गाढ़ा करके त्रिकुटा,
चित्रकमूल, त्रिफला, दारुहल्दी, देवदारु, वायविडंग, नागरमोथा यह
सब मण्डूरके बराबर लेकर (कूटकपड़छानकर) मिलावे । इसमेंसे
१ तोला परिमाण प्रातःकाल सेवन करे । औषधिके पचजानेपर भात
और माठा खाना चाहिये । इससे हलीमक, पाण्डुरोग, बवासीर,
शोथ, ऊरुस्तम्भ, कामला और कुम्भकामला यह सब रोग नष्ट
होते हैं ॥ ५१-५३ ॥