रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( २२५ )
परिभावितश्च सिद्धो भवेत्संग्रहणीकपाटः । वातो-
त्तरायां मरिचाज्ययुक्तः पित्तोत्तरायां मधुपिप्प-
लीभिः ॥ ४४ ॥ कफोत्तरायां विजयारसेन कटु-
त्रयेणाज्ययुतो ग्रहण्याम् । क्षये ज्वरे चार्शसि
षट्प्रकारे भगन्दरे चारुचिपीनसे च । मेहे च कृच्छ्रे
गतधातुवर्द्धने गुञ्जाद्वयञ्चास्य महामयघ्नम् ॥ ४५ ॥
मोती,सोनाभस्म,पारा, गंधक, सुहागा, अभ्रकभस्म और कौड़ीकी
भस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, शंखकी भस्म ७ भाग इन
सब द्रव्योंको एकत्रकर अलसीके क्वाथमें मर्दन करके गोला बना नरम
वस्त्रमें लपेटकर मूषामें संपुटकर हांडीमें रख दो प्रहरतक पकावे । जब
शीतल होजावे तब एक लोहेके पात्रमें डालकर धतूरेके पत्ते, चीतेकी
जड़ और मुसलीके रसकी अलग अलग भावना दे; फिर दो दो रत्तीकी
गोली बना लेवे। इस औषधिका वातजन्य ग्रहणी रोगमें कालीमिर्चोंके
चूर्ण और घृतके साथ, पित्तप्रधान ग्रहणीरोगमें पीपलके चूर्ण और
शहदके साथ, कफप्रधान ग्रहणी रोगमें भांगके रस; त्रिकुटेके चूर्ण
और घृतके साथ सेवन करे । क्षयरोग, छः प्रकारके अर्शरोग, भग-
न्दर, अरुचि, पीनस, प्रमेह, मूत्रकृच्छ्रमें और नष्ट धातुको बढ़ानेके
लिये इसका प्रयोग करना चाहिये । इसको संग्रहग्रहणीकपाट
रस कहते हैं ॥ ४२-४५ ॥
महाराजनृपतिवल्लभ रस ।
कर्षत्रयं मृतं कान्तं मृताभ्रं मृतताम्रकम् ।
मृतं तारं माक्षिकञ्च कर्षं कर्षं प्रदापयेत् ॥ ४६ ॥
मृतं स्वर्णं मृतं तारं टङ्कणं शृङ्गमेव च ।
वसिंरं दन्तिमूलञ्च मरिचं तेजपत्रकम् ॥ ४७ ॥
यमानी बालकं मुस्तं शुण्ठकञ्च सधान्यकम् ।