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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 107, कुल 584 में से

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पृष्ठ 107

भाषाटीकासहित । ( ८१ )
स्थालीपाकमें पहिले त्रिफलेका काथ डालकर पकावे उस काथके
सूखनेपर हस्तिकर्ण, पलाशकी जड़का रस, जिमीकन्दका रस, शतावरका
रस, भांगरेका रस और जामुनके फलोंका रस, अमलतासका रस क्रम-
पूर्वक डालकर सुखावे । अथवा जिस दोषकी शांतिके लिये लोहभस्म
सेवन करना हो उस दोषको नाश करनेवाले द्रव्यके स्वरसमेंभी स्थाली-
पाक करना हितकारक है ॥ १८ ॥ १९ ॥
पुटपाकविधि ।
स्थालीपाके सुसंपक्वं प्रक्षाल्य स्वच्छवारिणा ।
शुष्कं संचूर्ण्य यत्नेन पुटपाके प्रयोजयेत् ॥
पुटाद्दोषविनाशः स्यात्पुटादेव गुणोदयः ॥३२०॥
म्रियते च पुटालोहः पुटं तस्मात् समाचरेत् ।
यथा यथा प्रदीयन्ते पुटाः सुबहुशो यदि ॥२१॥
तथा तथा प्रकुर्वन्ति गुणानेव सहस्रशः ।
पुटपाकेन पक्वन्तु शस्यते रसकर्मसु ॥ २२ ॥
स्थालीपाकमें पके हुए लोहको स्वच्छ जलसे धोकर ऊपर नितरे हुए
जलको फेंक दे और लोहको सुखाकर बारीक चूर्ण करे । ( फिर इस
चूर्णमें आगे लिखे मारकद्रव्योंका रस डालकर रगड़े सूखनेपर संपुटमें
रख पुटमें फूंक दे ) इस प्रकार पुट देनेसे लोहके सब दोष दूर होजाते हैं
और बहुतसे गुण इससे प्रगट होजाते हैं एवं पुट देनेसेही लोहकी उत्तम
भस्म होती है । जैसे२ लोहको बहुतसी पुटें दी जावें वैसे २ ही लोह
सहस्रोंगुणोंके करनेवाला होता जाता है। पुटपाकसे भस्म हुआ लोहाही
रसकर्म और रसायनकर्ममें प्रशंसनीय होता है ॥ ३२०-२२ ॥
पुटोंकी संख्या ।
दशादिशतपर्यन्तो गदे पुटविधिर्मतः ।