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सर्वकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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पृष्ठ 607

५८२ रसतरङ्गिणी
शिलामयः शिलास्वेदः शिलानिर्यास इत्यपि ॥ ६० ॥
अश्मजं त्वश्मजतु कं गिरिजं त्वद्रिजं तथा ।
अश्मोत्थमश्मलाक्षा च गैरेयञ्च मतन्तु तत् ॥ ६१ ॥
भा.टी.—शिलाजतु, शैलेय, शिलाज, शैलधातुज, शिलामय, शिला-
स्वेद, शिलानिर्यास, अश्मज, अश्मजतु क, गिरिज, अद्रिज, अश्मोत्थ, अश्म-
लाक्षा और गैरेय, ये नाम शिलाजीत के कहे जाते हैं ॥ ६०, ६१ ॥
शिलाजतुपरिचयः
सूर्य्यसन्तापसन्तप्ताः शिलाः शैलाधिपस्य यद् ।
गोढं मुञ्चन्ति निर्यासं तच्छिलाजतु कीर्त्तितम् ॥६२॥
शैलाधिपशिलासारो निर्गतो रवितापतः ।
शुष्कः सन्मूर्त्ततां यातः शिलाजतु निगद्यते ॥६३॥
भा.टी.-जब ज्येष्ठ वैशाख की तीव्र सूर्य की किरणों से हिमालय की शिला
(चट्टान) गरम हो जाती हैं और उनमें होनेवाला रस पिघलकर बाहर आकर
जमने लगता है उसे शिलाजीत कहते हैं । अथवा हिमालय की शिलाओं का
सार सूर्य के ताप से चू करके बाहर आ जाता है और सूख करके काला कोल-
तार-सा हो जाता है उसे शिलाजीत कहते हैं ॥ ६२, ६३ ॥
वक्तव्य—यह देखने में कोलतार ( अलकतरा ) के समान काला और
गाढ़ा-सा द्रव होता है । सूखने पर चमकीला और भङ्गुर हो जाता है। यह जल
में घुल जाता है और तारों को छोड़ता है । अलकोहल, क्लोरोफार्म तथा ईथर
में नहीं घुलता है । रासायनिक प्रतिक्रिया में उदासीन रहता है ।
शिलाजतु विश्लेषण—शुद्ध शिलाजतु के विश्लेषण करने से उसमें जल
६.५%, ऐन्द्रियिक द्रव्य ३६.२०%, पार्थिव द्रव्य ३४.६५%, ( Nitrogenous
matters ) १.३%, चूना, ७.८०%, अभ्रक ( Mica ) १.३५%, मात्रा में
पाये जाते हैं । सम्भवतः इन्हीं तत्वों की उपस्थिति के कारण शिलाजतु त्रिदोष-
नाशक स्थिर किया गया हो । यह प्रायः सभी रोगों में लाभदायक होता है ।
कहा गया है—"न सोऽस्ति रोगों भुवि मानवानां शिलाजतु यन्न जयेत्प्रसह्य।"
आज-कल शिलाजीत काश्मीर, गढ़वाल, बागेश्वर ( अल्मोड़ा ), भूटान,
तिब्बत और गिलगित आदि पर्वतीय स्थानों से प्राप्त होता है । इसको वहाँ के
लोग छोटे-छोटे खण्डों में एकत्र करके भेजते हैं ।
कोई शिलाजीत को खनिज तैल मिनरल आयल ( Mineral oil )