रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयस्तरङ्गः १५
आज्यं = घृतम् ॥ २० ॥
आ.टी.--घी, गुड़ और शहद इन तीन द्रव्यों को मधुरत्रिक, त्रिमधुर
या मधुरत्रय शब्द से ग्रहण किया जाता है ॥ २० ॥
पञ्चामृतम्
गव्यं क्षीरं दधि घृतं माक्षिकञ्चाथ शर्करा ।
पञ्चामृतं समाख्यातं रसकर्मप्रसाधकम् ॥२१॥
पञ्चगव्यम्
गव्यं क्षीरं दधि घृतं गोमूत्रं गोमयं तथा ।
एकत्र योजितं तुल्यं पञ्चगव्यमिहोच्यते ॥२२॥
दधिघृतेऽपि गव्ये ग्राह्ये ॥ २१-२२ ॥
आ.टी.--गाय का दूध, घृत और दही, शहद और शर्करा (खाँड़) को
पञ्चामृत शब्द से लिया जाता है । इसके द्वारा रसों के अनेक प्रकार के कार्य
सिद्ध होते हैं ॥ २१ ॥
गाय के दूध, दही, घृत, गोमूत्र और गोबर के रस को एकत्र मिलाने पर
इसे पञ्चगव्य शब्द से लिया जाता है ॥ २२ ॥
क्षीरत्रयम्
रविशीरं वटक्षीरं स्नुहीक्षीरन्तथैव च ।
क्षीरत्रयमिति ख्यातं मारणादौ प्रशस्यते ॥२३॥
रविशीरं अर्कदुग्धम् ॥ २३ ॥
आ.टी.--आक का दूध, बड़ का दूध, थोंहर का दूध, इन तीनों को
एकत्र मिलाकर ग्रहण करने को क्षीरत्रय कहा जाता है । यह क्षीरत्रय धातु
आदि के शोधन-मारण में विशेषरूप से काम आता है ॥२३॥
दुग्धवर्गः
करिणी घोटिका धेनुस्त्वविका छागिकोष्ट्रिका ।
महिषी गर्दभी नारी काकोदुम्बरिका सुधा ॥२४॥
दुग्धिकोदुम्बरश्चार्को न्यग्रोधोऽश्वत्थतिल्वकौ ।
एषां दुग्धैःसमाख्यातो दुग्धवर्गः समासतः ॥२५॥
करिणीतो नारीपर्यन्तं जङ्गमवर्गः, काकोदुम्बरिकातस्तिल्वकपर्यन्तं स्थावर-
वर्गः उभयग्रहणं तन्त्रानुरोधात् । तिल्वको लोध्रः ॥ २४-२५ ॥
भा.टी.--हथिनी, घोड़ी, गाय, भेड़, बकरी, ऊँटनी, भैंस, गधी, स्त्री,