रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयस्तरङ्गः ११
कुल का पता न हो ऐसा और नास्तिक तथा गुरु की निन्दा करनेवाला
शिष्य विद्या पढ़ाने में स्वीकार नहीं करना चाहिये ॥ ३७, ३८ ॥
रसशालाविज्ञानीय नामक प्रथम तरङ्ग समाप्त हुआ ।
—:०:—
अथ परिभाषाविज्ञानीयो द्वितीयस्तरङ्गः
परिभाषाविज्ञानफलम्
परिभाषाध्यायमादौ योऽधीते रससाधकः ।
रसतन्त्रार्थविज्ञाने न स मुह्यति कुत्रचित् ॥१॥
स्पष्टम् ॥ १ ॥
भा.टी.--जो रससाधक वैद्य रसनिर्माण करने के पूर्व रसशास्त्र की परि-
भाषा को अपने अध्यापकों से अच्छी तरह पढ़ लेता है उसे रसशास्त्र के अर्थज्ञान
में कहीं भी कठिनाई नहीं आती है। अतः परिभाषाज्ञान अत्यावश्यक है ॥१॥
परिभाषालक्षणम्
निगूढानुक्तलेशोक्तसन्दिग्धार्थप्रदीपिका ।
सुनिश्चितार्था विबुधैः परिभाषा निगद्यते ॥२॥
स्पष्टम् ॥ २ ॥
भा.टी.—जिस संक्षिप्त और सांकेतिक शब्द द्वारा शास्त्र के गुप्त अप्रकट
अथवा किञ्चित् प्रकट तथा सन्दिग्ध भाव या अर्थ का स्पष्ट और निश्चित अर्थ
( मतलब ) प्राप्त हो उसे परिभाषा कहते हैं ॥ २ ॥
लवणपञ्चकम्
सैन्धवञ्चाथ सामुद्रं बिडं सौवर्चलं तथा ।
रोमकञ्चेति विज्ञेयं बुधैर्लवणपञ्चकम् ।.३॥
बिडसौवर्चले कृत्रिमे ॥ ३ ॥
भा.टी.—सैन्धानमक, समुद्रनमक, विडनमक, सौंचलनमक, रोमक (रेह)
नमक, इन पाँच नमकों को लवणपंचक नाम से कहा जाता है ॥ ३ ॥
लवणत्रिकम्
सिन्धुजं रुचकं पाक्यमेतत् त्रिज्रवणं स्मृतम् ।
प्रकीर्तितञ्च लवणत्रिकं वा लवणत्रयम् ॥४॥
रुचकं सौवर्चलम् , पाक्यं विडम् ॥ ४ ॥