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सर्वकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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पृष्ठ 304

२६२ रसतरङ्गिणी
द्वितीयः शोधनप्रकारः
भृङ्गराजरसेनेह दोलायन्त्रे विपाचिता ।
चतुर्यामं रोगशिला शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ ११० ॥
भृङ्गरसे यामचतुष्टयं स्विन्ना च शुध्यति ॥ ११० ॥
भा.टी.---मैनसिल को पोटली में बाँधकर इसको दोलायन्त्र में भांगरा-
स्वरस डालकर चार पहर तक पकाने से यह शुद्ध हो जाती है ॥ ११० ॥
तृतीयः शोधनप्रकारः
बीजपूररसेनेह भाविता तु मनःशिला ।
सप्तवारं विधानेन विशुध्यति न संशयः ॥ १११ ॥
बीजपूरो निम्बूकविशेषः ॥ १११ ॥
भा.टी.---मैनसिल को सात भावना बिजौरा नींबू के रस की देकर अन्त
में उसे जल से धोकर सुखा लेने से वह शुद्ध हो जाती है ॥ १११ ॥
चतुर्थः शोधनप्रकारः
जयन्तीस्वरसेनेह दोलायन्त्रे विपाचितः ।
चतुर्यासं विधानेन विशुध्यति मनःशिला ॥ ११२ ॥
जयन्ती 'जइता' इति भाषायाम् ॥ ११२ ॥
भा.टी.---जयन्ती स्वरस को दोलायन्त्र में डालकर इसमें मैनसिल की
पोटली को चार पहर तक स्वेदन करने से भी यह शुद्ध हो जाती है ॥११२॥
पञ्चमः शोधनप्रकारः
अगस्त्यपत्रस्वरसैर्भावयेत्सप्तवारकम् ।
मनःशिला प्रयत्नेन शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ ११३ ॥
अगस्त्यः तदाख्यः पुष्पतरुः प्रसिद्धः ॥ ११३ ॥
भा.टी.---अगस्त्य पत्तों के स्वरस में मैनसिल की सात भावना देकर सुखा
लेने से वह शुद्ध हो जाती है ॥ ११३ ॥
षष्ठः शोधनप्रकारः
आर्द्रकस्वरसेनेह मनोगुप्तां हु भावयेत् ।
सप्तवारं विधानेन शुद्धिमाप्नोति सर्वथा ॥ ११४ ॥
भा.टी.---मैनसिल को अदरख की सात भावना देकर सुखा लें तो वह
अच्छी तरह शुद्ध हो जाती है ॥ ११४ ॥