रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५ चतुर्थस्तरङ्गः ६५
गर्त बनाकर इसमें पारद गन्धक
की कजली डाल दें । गर्त के
चारों तरफ एक अंगुल ऊँची
कुड्य ( पाली मेंड या दीवार )
बनावें । अब एक ऐसी गोस्तना-
कार ( गाय के थन के समान
आकार अर्थात् आगे को कुछ
पतली गोल और पीछे को चौड़ी
चपटी ) मूषा लें, जो कुड्य पर
अच्छी तरह जम सकती हो, उसे
जमाकर अर्थात् पाली को मूषा से
अच्छी तरह ढककर तोय-मृत्तिका
से इसकी सन्धियों को अच्छी तरह
बन्द कर दें । ( र. र. स. )
धूपयन्त्र
एक ऐसा लोहे का पात्र लें जो
आठ अंगुल ऊँचा, आठ अंगुल चौड़ा
हो । उसमें गन्धक, हरताल तथा
मैनसिल धूपन द्रव्य ( धुआँ देनेवाले )
जिनसे स्वर्ण तथा रजतपत्रों को धुँआ
देना हो, डाल दें । अथवा सीसाभस्म
डाल दें । उस पात्र में कण्ठ प्रदेश के
नीचे निर्मित जलाधार पर पतली-
पतली लोहे की शलाकायें ( या लोहे
की पतली जाली ) लगा दें । उन
शलाकाओं या जाली पर स्वर्ण के
बारीक कण्टकवेधी पत्र रख दें । अब
इस लोहपात्र के ऊपर दूसरा लोहपात्र
उलटा मुख रखकर कपड़मिट्टी से