रसार्णव (शैव रस-तन्त्र - प्राचीन भारतीय खनिज रसायन, धातुवाद एवं रस-चिकित्सा सटीक)
Rasarnava: Tantric Chemistry and Alchemy with Commentary
शिव-पार्वती संवाद (सम्पादक: प्रफुल्लचन्द्र राय एवं हरीशचन्द्र कविराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थः पटलः । ४९
तुषं वह्निसमं दग्धं¹ मृत्तिका चतुरंगिका² ।
कूपी³पाषाणसंयुक्ता वरमूषा⁴ प्रकीर्त्तिता ॥ ३७ ॥
प्रकाशा चान्धमूषा च मूषा तु द्विविधा स्मृता⁵ ॥ ३८ ॥
प्रकाशमूषा देवेशि शरावाकारसंयुता ।
द्रव्यनिर्वाहणी सा च वादिकैः⁶ सुप्रशस्यते ॥ ३९ ॥
अन्धमूषा तु कर्त्तव्या गोस्तनाकारसन्निभा ।
पिधानकसमायुक्ता किञ्चिदुन्नतमस्तका⁷ ॥ ४० ॥
पत्रलेपे तथा रङ्गे⁸ द्वन्द्वमेलापके तथा ।
सैव च्छिद्रान्विता⁹ मन्दा गम्भीरा सारणोचिता ॥ ४१ ॥
तिलभक्षा द्विरंशं तु¹⁰ इष्टकांश¹¹समन्वितम् ।
(1) तुषं दग्धसमं दग्धं, a variant in K, which is a senseless tautology.
2) B reads चतुरंशका. (3) K reads कूर्चा. M reads कूर्णी. (4) B,
K and M read वज्रमूषा. According to रसरत्नसमुच्चय this appears to be
वरमूषा (Chap. X. v. 15.) Hence we have adopted the reading in रस.सः
in order to avoid tautology. (5) प्रकृतिर्द्विविधा स्मृता, a variant in
K. (6) K reads वेदिकैः. M reads सा चावेदिकैः. (7) किञ्चि-
दुन्नतस्तका, a variant in K. किञ्चिदुष्ठितमस्तका, a variant in M. Both
are incorrect. [उन्नत should be उत्तान, and उष्ठित should be उत्थित]
This मूषा is called in रस.स. as गोस्तनी. (Vide Chap. X. v. 25.) (8) B
reads तत्र लेपे. K reads भागे in place of रङ्गे. (9) M reads च्छिद्रा-
न्वतान्विता, which is a mistake of the scribe. (10) M reads
द्विरंशस्तु, which is not correct. (11) B reads रमकांश. K reads
इष्टाकांश. Both appear to be incorrect.
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