झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
३६६ झांसी की रानी
करते हुये मरना जीवन का ही दूसरा नाम है। जो लोग अङ्गरेजो से
डरते हो, मौत से डरते हो वे हथियार रखकर आराम के साथ अपने घर
चले जाये। जो लोग स्वराज्य के लिये प्राण विसर्जन करना चाहते हो,
वे मेरे पास बने रहे।'
रानी फिर मुस्कराई। सब लोगो की ओर देखा। किसी ने
'हथियार रखकर आराम के साथ घर जाने' की बात नही कही। सबने
लडमरने का रानी को आश्वासन दिया।
'श्रीमन्त सरकार आज रात से ही, अभी से, अपनी घनगरज का
काम देखे।' गुलाम गौस ने कहा।
भाऊ बख्शी बोला, 'सरकार को सपने में जो देवी दिखलाई दी थी
वही मेरी तोप पर काम करेगी। कडक बिजली ने कामासिन पहाडी तक
को छार छार न कर दिया तो बात काहे की।'
'सरकार,' खुदाबख्श ने कहा, 'सैयर फाटक पर से अब जो कुछ
होगा, उस पर आप को बहुत हर्ष होगा।'
मोतीबाई बोली, 'सरकार, मुझको और मेरी सङ्गिनो से अलग
मोर्चे दिये जायें और फिर देखा जाय कि स्वराज्य की लडाई के लिये
झांसी की स्त्रिया अकेले क्या क्या कर सकती हैं।'
बाहर से आये हुये पठानों के सरदार गुलमुहम्मद ने कहा,
'अलहमदुलिल्लाह, हुजूर हम न बहुत समझता है और न बहुत सुनता
है। सिर्फ इतना अरज हे कि हम लोग झासी की मिट्टी में मिलेगा
और बहिश्त लेगा। सोराज की आप जानो।'
रानी ने सरदारो को जी खोलकर पुरस्कार बांटे और उनके सिपाहियो
के लिये भी इनाम दिये। मुख्य मुख्य लोगो को रणकंकण अपने हाथ से
बाधे और पीठ पर हाथ फेरा। पुरस्कृत केवल तीन व्यक्ति नही हुये, — वे
उस समय किले में थे भी नही, — दूल्हाजू, पीरअली और बरहामुद्दीन।
निराशा के वातावरण का कुहरा छट गया। उत्साह का तीव्ररवि चढ
आया। रात भर विकट, तीक्ष्ण, भीषण गोलबारी किले और बाहर
लक्ष्मीबाई ३६७
की बुर्जो पर से हुई । रोज़ की सेना ने बहुत हल्का जवाब दिया । सैनिक
रक्षा के स्थानो में पडे पडे विश्राम करते रहे । यदि उस रात झासी की
सेना फाटक खोलकर टूट पडती, तो रोज की सारी सेना नष्टभ्रष्ट हो
जाती । झासी का गोलाबारी का शोरगुल अत्यन्त तीव्र हुआ, परन्तु उससे
अङ्गरेजी सेना को सापेक्ष में हानि बहुत कम पहुची । रोज़ को आश्चर्य
था—झांसी में इतनी युद्ध सामग्री कहा से आ रही है ।
रानी का वही क्रम जारी था—एक मोर्चे से दूसरे मोर्चे पर पहुचना,
निरीक्षण करना और उत्साह प्रदान करना । एक स्थल पर जवाहरसिंह
से भेट हो गई ।
रानी ने पूछा, 'उस मामले की जाच पडताल की ?'
जवाहरसिंह ने उत्तर दिया, 'जी हाँ सरकार पीरअली बुरी कसम
खाता है । कहता है कि दीवान दूल्हाजू को रक्षा के लिए साथ ले गया
था । रात में जो जासूसी उसने की उससे और कुछ पता तो नही लगा,
क्योकि रोज़ ने अपनी योजन। केवल अपने मातहत जनरलो की बतलाई
थी, परन्तु यह अवश्य मालूम हो गया है कि अङ्गरेजो को अभी तक दो
लाख रुपये की तो बारूद ही खर्च करनी पडी है । उनके पास बारूद की
कमी हो गई है और गोले भी बहुत नहीं हैं । शायद कलकत्ते से कुमुक
मंगवाई है ।
रानी ने कहा, 'मुझे भासता है अग्ररेज लोग कल विकट युद्ध करेगे ।
तात्या का जो सामान उन लोगो के हाथ पडा होगा उससे उनको बहुत
सहायता मिलेगी । न जाने विचारी काशी और जूही कहा होगी ।'
जवाहरसिंह उत्तर ही क्या दे सकता था ?
रानी ने एक क्षण सोचकर कहा, 'दीवान दूल्हाजू मिले ? उनसे पूछा ?'
'नही मिले, जवाहरसिंह ने उत्तर दिया, कुमुक बदल गई है ।
सुन्दरबाई ओर्च्छा फाटक पर है । दीवान साहब कही चले गये हैं ।'
'बरहामुद्दीन ?' रानी ने प्रश्न किया ।
३६८ झांसी की रानी
जवाहरसिंह ने जवाब दिया, सागर-खिडकी पर था। मैंने उसको
- सावधान रहने के लिये झिडक दिया है।'
इसी समय किले वाले महल पर जोर का धडाका हुआ। रानी किले
की तरफ चली। जवाहरसिंह भी। रानी ने निवारण किया, 'आप शहर
के मोर्चों को एक वार फिर देखकर थोडा विश्राम करलो। मै देखती हूँ
यह क्या है।'
रानी ने किले में जाकर देखा। गोला महल पर पडा था। महल के
दो खण्ड नष्ट हो गये। पानी भरने वाले ब्राह्मण और मन्दिरो के
पुजारी महल के बीचोबीच नीचे वाले खण्ड में छिपे हुये थे। रानी ने
उनको दिलासा दी। खुद महल के बाहर टहलने लगी। दो बज गये थे।
गुलाम गौस पश्चिमी तोपखाने पर अन्य तोपचियो के साथ था—लालता
मारा जा चुका था। दक्षिणी तोपखाने पर मोतीबाई, पूर्वीय पर भाऊँ
बख्शी और केन्द्रीय पर मुन्दर। इन लोगो को महल का हाल बतलाया।
उन्होने निशाने साधे। अनुभव से दुश्मन के ठीक स्थलो की सही
जानकारी हो गई थी। गोलाबारी से अङ्गरेजी तोपखाने बन्द हो गये।
महल में छिपे हुये ब्राह्मण इत्यादि पसीने में तर बाहर निकल आये और
सुखपूर्वक सो गये।
सवेरे एक चिट्ठी बरहामुद्दीन ने रानी के हाथ मे दी। वह उसका
इस्तीफा था। उसमें लिखा था. -
'मेरा विश्वास नही किया गया। मुझको उल्टा डाटा-फटकारा गया।
मेरा मन काम मे नही लगता। मैं नौकरी छोड़ता हूँ। हथियार पीरअली
को दे दिये हैं। पीरअली और दूल्हाजू से होशियार रहियेगा।'
रानी को क्रोध आने को हुआ, परन्तु उन्होने सयम कर लिया।
बोली, 'ऐन समय पर तुम जैसे लोग ही काम छोड़ते हैं। जाओ
हटो।' और चिट्ठी उन्होने अपने अङ्गरखे की जेब मे रख ली।
लक्ष्मीबाई ३६६
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दूसरे दिन जैसा युद्ध हुआ उससे रोज की सेना के छक्के छूट गये ।
बहुत उपाय करने पर भी रोज उस दिन एक अगुल बराबर भी सफलता
प्राप्त न कर सका । नित्य की वही कहानी-दीवारो में छेद हुये, बुर्जो की
मुडेरे जगह-जगह पर टूटी, शहर में मकान ध्वस्त हुये, आगें लगी, कुछ
लोग मरे, दीवारो और बुर्जो की मरम्मत तुरन्त कर ली गई, आगे बुझा
ली गई, लोगो के मरने से जीवितो में और अधिक हिंसा जागी और
दृढता वढी । रात को भी वही क्रम । युद्ध की भयकरता ने स्थिरता पकड
ली । वह झांसी वालो के जीवन में एक नित्य की बात हो गई ।
रानी ओर्छा फाटक पर पहुँची । दूल्हाजू अभी ठिये से हटा न था ।
सुन्दर भी मौजूद थी ।
रानी ने यकायक पूछा, 'दूल्हाजू, तुम पीरअली के साथ अंग्रेज
छावनी में कभी गये ?'
'अंग्रेज छावनी में में...मैं,' रुंधे गले से दूल्हाजू ने जवाब दिया,
'में सरकार कब ?'
रानी—'कभी सही । गये या नही ?'
दूल्हाजू—'में ! मैं . तो, कभी...कहा . गया !'
रानी—'नहीं गये ?'
दूल्हाजू—'नही सरकार ।'
रानी—'पीरअली कहता है कि तुम उसके साथ गये थे ।'
दूल्हाजू—'वह झूठ बोलता है, सरकार ।'
रानी—'सम्भव है । और यह लाल झण्डा क्या है ?'
दूल्हाजू—'लाल झण्डा ! लाल कैसा ? झण्डा क्या सरकार ?'
रानी—'घबराओ मत, में लाल झण्डे की सब बात जानती हूँ ।'
दूल्हाजू—'में थक गया हूँ सरकार । दिमाग काम नही कर रहा है ।
कुछ समझ में नहीं आ रहा है । लाल झण्डा ! पीरअली बडा बेईमान
और झूठा है ।'
४०० झांसी की रानी
सुन्दर—'आज इनसे तोप ठीक नही चली।'
'ये मुझ से व्यर्थ रुष्ट हैं। इनको बराबर प्रसन्न रखने का प्रयत्न
करता हू।'
रानी—'कोई बात नही। कल ठीक ठीक काम करना। सुन्दर साथ
है। वह सहायता करेगी।'
रानी को बरहामुद्दीन याद आ गया। वह और अधिक इस्तीफे नही
चाहती थी।
सुन्दर बोली, 'इनको किले में रख लीजिए। मैं आज रात और
कल दिन भर तोपखाना सभाले रहूँगी।'
रानी ने कहा, 'आज रात आराम के साथ काम कर लो, कल दिन
में अवकाश नही मिलेगा। कल रात इस मोर्चे का ऐसा प्रबन्ध करूंगी
जिसमें तुम दोनो को काफी विश्राम मिल जाय।'
रानी सागर खिडकी पर पहुंची। उस समय पीरअली कार्यभार
अपने स्थानापन्न को सोप रहा था।
उनको देखते ही हडबडा गया।
रानी ने कहा, 'दूल्हाजू कहते हैं कि कल तुम्हारे साथ कभी बाहर
नही गये। तुमने दीवान जवाहरसिंह से कहा कि तुम्हारे साथ गये थे?'
पीरअली ने हिम्मत बांधी। बोला,
वे मेरे साथ जरूर गये सरकार। डर के मारे उन्होने सच्ची बात नही
कही। व्यर्थ झूठ बोले। मैं उनके मुह पर कह सकता हूँ। दिशा मैदान
के बाद हाजिर हो जाऊंगा।'
रानी ने कहा, कोई जल्दी नही थोडी देर में किले पर आओ।'
'बहुत अच्छा हुजूर,' पीरअली ने मुक्ति की सास लेकर कहा।
रानी पूर्व और उत्तरी फाटको पर होती हुई उन्नाव फाटक पर आई।
यहा पूरन कोरी अन्य कोरियो के साथ तोप पर था। कोरियो को
शाबाशी दी।
पूरन से पूछा, 'झलकारी कहा है ? अच्छी तरह तो है ?'
लक्ष्मीबाई ४०१
'सरकार,' पूरन ने कहा, 'घरै है। अबई बुलाउत, दिन भर इतै
काम करत रई, अबई थोडी देर भई जब गई।'
'नही बुलाओ मत।' रानी बोली, 'वैसे ही पूछा।'
वे आगे बढ़ गईं।
सब फाटको से घूमती हुई हलवाई पुरे में आईं। बाजार का चौधरी
मिला। लखपतियो में से था। यह सबेरे इतने पानी से हाथ-मुंह धोया
करता था कि पानी सौ सवासौ गज तक बह जाता था।
रानी ने मुस्करा कर कहा, अब भी उतने ही पानी से हाथ धोते हो?'
'सरकार,' चौधरी ने उत्तर दिया, 'आज कल सब ब्योपार बन्द है।'
मुँह हाथ धोते धोते इतने व्योपारियो से बात करनी पडती थी कि पानी
बहाने का ध्यान ही न रहता था।'
रानी ने कहा, 'अब ब्योपार के साथ पानी बहाना भी बन्द है।'
उस महा कठिन परिस्थिति में भी रानी की इस बात पर बाजार
वाले हँसे, हँसते रहे और विपत्ति में धैर्य और साहस पाते रहे।
जो मिला, उससे कोई न कोई मीठी बात कह कर, ढाढस बँधाती
हुई रानी किले पर लौट आईं। गोलाबारी का वही क्रम जारी था।
रात समाप्त हुई।
रानी ने सबेरा होते ही सिपाहियो और उनके सरदारो में समाचार
भेजा — आज मैं स्वयं अपने लोगो के लिए कलेवा तैयार करू गी। खूब
खाओ और डट कर लडो।'
सुनते ही थके मादे और मृत सिपाहियो तक की छातिया फूल
उठी।
ब्राह्मणो ने आटा रांधा। रानी ने उसमें हाथ लगाया। ब्राह्मणो ने
ही पूडिया सेकी। रानी ने उसमें भी सहयोग दिया। किले के भीतर
वाले सरदारो को उन्होने अपने हाथ से उनके ठियो पर जा जाकर
कलेवा वितरित किया।
४०२ झांसी की रानी
हर्ष और अभिमान के मारे वे सब के सब उन्मत्त हो गये । रानी की
छुई हुई पूडी तक के एक एक टुकडे को पगडी के, अगरखे के छोर में
कस के बाध लिया । और कसकर बाधे—प्राणो की गाठ में प्रण ।
रानी को पीरअली का स्मरण आया—भूलती तो वे कभी कुछ थी
ही नही । बुलवाया । मालूम हुआ कि दिशा मैदान के लिए जाने के
बाद फिर नही दिखलाई पडा; यह भी पता लगा कि दिशा निस्तार के
लिये मुहरी के रास्ते से गया था ।
रानी एक क्षण के लिये असमजस में पडी ।
उनको विश्वास हो गया कि पीरअली, झूठ बोलता है, और
कदाचित् दूल्हाजू सच, परन्तु बरहामुद्दीन ने लिखकर दिया था—
पीरअली और दूल्हाजू से होशियार रहियेगा । किसी निश्चय पर पहुँच
चुकी थी कि चारो दिशाओ से अंग्रेजो ने गोलाबारी शुरू कर दी ।
लक्ष्मीबाई ४०३
[ ७५ ]
रानी ने झटपट दलपतियो और गोलन्दाजो को यथोचित आज्ञाये दी।
अङ्गरेजो का निश्चय जान पडता था कि कही से भी परकोटे की
दीवार को फोडे और झासी में घुस पडे और झासी वालो का निश्चय
था कि जब तक शरीर में रक्त है तब तक दुश्मन का पैर झासी के भीतर
न पडने देगे।
झासी की गोलाबारी से आकाश में चलते हुये गोलो की आग की
चादर तन गई। इस चादर मे से अँग्रेज़ी सेना के सिर पर फटे हुये गोलो
से गोलिया, कीले-किर्चें बरसती थी। भूनकर खाक कर डालने वाली
हवाइया विस्फोट कर रही थी। दक्षिणी मोर्चे पर, जीवनशाह की टौरिया
से लेकर ओर्छा फाटक के सामने वाली टेक* तक अँग्रेजी तोपखाने
अत्यन्त वेग के साथ जवाब दे रहे थे।
अपने तोपखानो की रक्षा मे अँग्रेज बन्दूकची जीवनशाह की टौरिया
से ओर्छा फाटक की टेकडी के बीच में सबरे बाघकर ओर्छा फाटक और
सैयर फाटक की ओर बढे। परकोटे की बुर्जों और कोट की दीवार के
छेदो में से बन्दूको और हलकी तोपो ने यमराज के शापो को उगला।
अँग्रेजी पल्टन बिछने लगी। पैर उखडे। पीछे भागने को हुई परन्तु उस
क्रिया में भी उद्धार न पाकर मार्ग के पत्थरो की ओट मे छिप गई।
लेकिन एक दस्ता ओर्छा फाटक की ओर बढ आया। अँग्रेजी तोपखाने ने
भीषणतर गोलाबारी आरम्भ की। सैयर फाटक की ओर भी एक
दस्ता बढा।
रानी और मोतीबाई ने दूरबीन से देखा। ओर्छा फाटक के सामने
वाली टेक के पीछे लाल झण्डा उठा। ओर्छा फाटक पर का तोपखाना
कुछ धीमा पडा।
'सरकार,' मोतीबाई ने अनुनय किया, 'मुझको उस ओर जाने
दीजिये। सुन्दर अकेली है। दूल्हाजू के हाथ पाव ढीले हो गये हैं।'
*अब इस पर मैकडानैल हाई स्कूल और बोर्डिगहाउस बन गये हैं।
'जाओ मोती । हीरा बनकर लौटना' रानी ने कहा ।
मोतीबाई चली गई । खुदाबख्श सैयर फाटक पर था । उसने मोती-
बाई को आगे नही बढने दिया ।
बोला, 'ओर्छा फाटक पर मत जाओ । यही मेरे साथ रहो आज मै
अपने देश, अपनी रानी का नमक अदा करूंगा । मरूगा । मेरी लाश
को ठिकाने लगा देना ।'
मोतीबाई का चेहरा कुम्हलाया हुआ था, परन्तु उसके सौन्दर्य की
किरणे छुटकी पड़ रही थी । आखो में आसू आ गये ।
तोप पर पलीता डालते डालते खुदाबख्श ने चिल्लाकर कहा, 'यह
वक्त आसुओ का है ?'
मोतीबाई ने बारूद की कालोच वाले हाथो से आसू मसल डाले ।
बोली, 'नही । अब आसू नहीं आवेंगे ।'
खुदाबख्श ने उमग के साथ कहा, 'आज मै आपका, हमेशा के लिये,
कैदी हो गया ।'
मोतीबाई आख मिलाकर बोली, 'और हमेशा के लिये मैं आपकी ।'
खुदाबख्श ने देखा कि रास्ते पर गोरे फाटक की ओर बढे चले आ
रहे हैं । तोपो और बन्दूको की बाढ हुई ।
खुदाबख्श ने मोतीबाई को आदेश दिया, 'दाहिने हाथ की पूरी
सतर तक बन्दूके, पत्थर, कटे हुये पेड़ो के लक्कड इन लोगो के सिर पर
पटकवाओ । दौडो । अँग्रेज वहा से सीढी लगाकर चढने का उपाय कर
रहे हैं ।'
मोतीबाई दौडी । सीढी लगाने का उपाय करने वाले सब के सब
मारे गये—उनके ऊपर गोलियां, पत्थरो के बडे बडे ढोके और कटे हुये
पेड़ो के लक्कड जो वहां पहले से जमा थे बरसाये गये । शहर और किले
से ढोल, ताशे और तुरही का कान फोडने वाला नाद हुआ । अग्रेजो ने
अपनी पैदल पल्टन को वापिस बुलाने का बिगुल बजाया । पल्टन गिरते-
मरते लौट पडी ।
लक्ष्मीबाई ४०५
रोज़ जीवनशाह की टौरिया के पीछे घोड़े पर था और उसके
मातहत अफ़सर बगल में ।
रोज़ ने कहा, 'नाऊ आर नैव्हर ( या तो अभी या कभी नही ) ।'
तार से यह आदेश ओर्छा फाटक टेक और जार पहाड़ी के तोपखानो को
दिया गया । ओर्छा फाटक टेक ने इसका जो अर्थ लगाया वह लाल
झंडे को और ऊँचा करना था ।
इधर रोज़ के चार अफ़सर—चारो लैफ़्टिनेट—यौवन प्रमत्त—
टेकडियो, पत्थरो और अपनी तोपो की बाढो की आड़े लेते हुए सैयरफाटक
की दाहिनी बगल की टेक की दीवार के नीचे पहुँच गये । उस जगह
दीवार थोड़ी देर पहले ही आधी ध्वस्त हो गई थी । साथ ही उस जगह वाले
झांसी के सैनिक मारे गये थे । इन अफ़सरो में से दो ने अपनी देह की
सीडी बनाई । उन पर-से-बाकी दोनो चढ़ गये । इन दोनो ने अपनी सेना
के एक दस्ते को सकेत किया । दस्ता आगे बढ़ा । इतने में तलवार लिए
मोतीबाई टूट पड़ी । लैफ़्टिनेट ने पिस्तौल चलाई । खाली गई । मोतीबाई
ने एक वार मे ही उसको खतम कर दिया । दूसरे लैफ़्टिनेट ने तलवार के
हाथ किये, परन्तु मोतीबाई ने उसको भी समाप्त किया । नीचे वाले दोनों
अफ़सर एक पत्थर की आड में छिप गये । इतने में झाँसी के दूसरे
सिपाही वहा आ गये । खुदाबख्श के तोपखाने ने आगे बढ़ते हुये दस्ते
को नष्ट कर दिया और मोतीबाई के निकट वाले सिपाहियो ने उन दोनो
लैफ़्टिनेट को बन्दूक से समाप्त कर दिया । यह अंग्रेज़ी सेना की दूसरी
हार हुई ।
उत्तरी फाटको पर भी ज़ोर का हमला था, परन्तु ठाकुरो, काछियो,
कोरियो और तेलियो की चतुरता तथा बहादुरी के कारण वहा अंग्रेज़
कुछ नही कर पा रहे थे ।
इधर दक्षिणी मोर्चों पर अंग्रेजो ने तीसरा आक्रमण शुरू किया ।
४०६ झांसी की रानी
रानी ने किले पर से देखा कि ओर्छा फाटक का तोपखाना बहुत
मन्द गति से काम कर रहा है। उन्होने रामचन्द्र देशमुख को तुरन्त भेजा,
परन्तु देशमुख को वहा तक पहुँचने के लिये समय चाहिये था।
मोतीबाई खुदाबख्श के पास पहुँच गई। ओर्छा फाटक की टेक के
पीछे लाल झण्डा और ऊँचा हुआ। खूब हिला फिर छिप गया।
दूल्हाजू ने केवल बारूद भर भरकर तोप चलाई—उसमें से गोले निकलते
ही कैसे ?
सुन्दर उससे पश्चिम की ओर जरा हट कर ऊँची बुर्ज पर से तोप चला
रही थी। उसके साथी गोलन्दाज मारे जा चुके थे। केवल उसकी तोप
कुछ काम कर रही थी। उसने दूल्हाजू का व्यापार देख लिया।
सामने की टेक के पीछे से गोरी पलटने टिड्डी दल की तरह उबर पडी
और 'हुर्रा' घोष करती हुईं भरोसे के साथ ओर्छा फाटक पर दौडीं।
दूल्हाजू लोहे का एक छड हाथ में लेकर बुर्ज से नीचे तुरन्त उतरा।
सुन्दर को समझने में एक क्षण की भी देर नही लगी। उसने भी तोप
छोड दी। केवल तलवार उसके पास थी। तलवार खींच कर अपनी बुर्ज
से नीचे उतरी। वहा से ओर्छा फाटक जरा दूर पडता था।
सुन्दर के नीचे उतर पाने के पहले ही दूल्हाजू फाटक के पास पहुँच
चुका था। फाटक पर मोटी साकलो और कुन्दो में मोटी भर वाले ताले
पडे हुये थे। कुन्जियाँ किले मे थी, परन्तु दूल्हाजू के हाथ में लोहे की
मोटी छडी तो थी। उसने ज़रा भी बिलम्ब नही किया।
उछल कर ताले में छड डाली। तडाक से ताला टूट गया। दूसरे
और तीसरे में डाली। सब टूट गये। दो साकलो को भी तोड दिया और
तीसरी साकल खोल दी। फाटक केवल भिडे रह गये। दूल्हाजू फाटको
को खोल नही पाया था कि नङ्गी तलवार लिये सुन्दर आ पहुँची।
'देशद्रोही, नरक के कीडे,' सुन्दर ने कडककर कहा, तू अंग्रेजो मे
कुछ नही पावेगा।' सुन्दर दूल्हाजू पर पिल पडी।
लक्ष्मीबाई ४०७
उसकी तलवार का वार दूल्हाजू ने लोहे की छड पर झेला । तलवार
भन्ना कर बीच से टूट गई । तलवार का जो टुकडा सुन्दर की मुट्ठी में
बचा था उसी को तानकर सुन्दर दूल्हाजू पर उछली । दूल्हाजू ने छड
का सीधा हूला दिया । वह ठप से बाये वक्ष पर लगा । साथ ही बाहर
तुमुल 'हुर्रा' घोष हुआ ।
चोट की परवाह न करके सुन्दर ने फिर वार किया । दूल्हाजू पीछे
हटा । परन्तु उसने सुन्दर के पेट पर छड अडा दी । उधर गोरो ने धक्के
से फाटक खोल लिया । सुन्दर के मुँह से 'हर हर महादेव' निकला था
कि एक गोरे की गोली ने सौन्दर्यमयी सुन्दर को अमर कर दिया । गोली
उसके सिर पर पडी थी ।
दूल्हाजू ने छड पृथिवी पर टेक दी । दूल्हाजू पर भी गोरो की
बन्दूके सीधी हुई परन्तु उनके अफसर ब्रिगेडियर ने तुरन्त निवारण
किया, 'आवर मैन' ( अपना आदमी है ) ।
गोरो ने बन्दूके नीची करली । टिड्डी दल की तरह भीतर घुस पडे ।
अफसर ने कहा, 'यह रानी है ?'
दूल्हाजू ने उत्तर दिया, 'नही साहब महज नौकरानी ।'
अफसर ने अपने साथियो से कहा, 'बट ए सोल्जर शी विल हैव
ए सोल्जर्स आनर ।' (लेकिन सिपाही है । सिपाही की इज्जत उसको
मिलेगी ) ।
स्वर्गवासिनी सुन्दर की दृढ मुट्ठी अभी ढीली नही हुई थी । तलवार
का छोटा-सा टुकडा अब भी उसकी मुट्ठी में था । दो गोरे उसके शरीर
को बाहर ले गये और पत्थरो से दाब दिया । जहा उनके और नत्थेखा
के भी अनेक सिपाही दबे हुये थे । उसके उपरान्त वे लोग सब दिशाओ
में, शहर में घूमने लगे ।
टेक के पीछे से रोज के पास तार द्वारा नगर विजय का संवाद
पहुँचा ।
४०८ झांसी की रानी
रोज ने अफसरों से कहा, 'उस आदमी को जागीर में गांव पक्के
हुये।' दूल्हाजू के उस कृत्य का समाचार बहुत शीघ्र चारो ओर फैल गया।
फिर रोज ने तुरन्त आदेश दिया कि सैंयर फाटक को तोड़ो शहर
में बढ़ो और सब बागियों का नाश करो।
खुदाबख्श के फाटक पर कहर पर कहर बरसने लगे। इसी समय
रामचन्द्र देशमुख घोड़े पर आया। उसी समय एक गोली खुदाबख्श को
लगी। सैंयर फाटक का तोपखाना बन्द हुआ। एक अङ्गरेज दीवार पर
चढ़ा। मोतीबाई ने तलवार से उसका सिर कलम कर दिया और
खुदाबख्श की लाश को टांग कर नीचे उतर आई। रामचन्द्र ने मोतीबाई
को अपने पीछे घोड़े पर बिठलाया और लाश को सामने लाद कर किले
पर चढ़ आया। उसके किले में आते ही किले का फाटक बन्द कर लिया
गया। लाश को महल के पास रख कर ढक दिया गया। मोतीबाई की
आंख से आँसू नही निकला।
रानी आ गई।
'मोतीबाई,' रानी ने कहा, 'तुम लोगो का अक्षय कर्म मैने अपनी
आंखो देखा है।'
सरकार मोतीबाई ने भर्राये हुये स्वर में कहा, 'काम देखिये। अपने
पास किला अब भी है और आप हैं। मैं इनका प्रबन्ध करती हूँ।'
'महल के बिलकुल निकट ही,' रानी कण्ठ को संयत कर के बोली,
'कुंवर साहब को दफनाया जावे।'
देशमुख ने पूछा, 'सुन्दर ?'
'ओर्छा फाटक पर मारी गई,' मोतीबाई ने उत्तर दिया, 'दूल्हाजू ने
देश द्रोह करके फाटक खोल दिया।'
रानी ने ओठ सटाये।
धीरे से बोली, 'जीवन में यही बड़ा भारी धोखा खाया।'
फिर उन्होंने ज़रा जोर से कहा, 'बरहामुद्दीन ने ठीक कहा था उसके
साथ अन्याय हुआ। कहा है, कुछ जानते हो देशमुख ?'
लक्ष्मीबाई ४०६
'नही सरकार,' देशमुख ने सक्षिप्त उत्तर दिया ।
रानी ने अंगरखे की जेब में हाथ डाला ।
बरहामुद्दीन का इस्तीफा जेब में था । उसको उन्होने वही पडा
रहने दिया ।
मोतीबाई ने महल के पास ही कबर के लिये मिट्टी खुदवानी आरम्भ
करदी और बहुत शीघ्र एक बडा गड्ढा खुदवा लिया ।
रानी दूरबीन लेकर ऊपर के बुर्ज पर चढ गईं ।
रोज़ नगर की बुर्ज पर बुर्ज अपने अधिकार में करता चला जा रहा
था । गोरे शहर भर में फैलते चले जा रहे थे । झासी की सेना मरती-
कटती जा रही थी । आगें लगाई जा रही थी । झांसी मे हाहाकार हो रहा
था और उसके साथ तुमुल 'हुर्रा' घोष । रानी ने देखा कि शहर वाले महल'
नाटकशाला और महल के सामने वाले विशाल पुस्तकालय को, गोरे
घेरने का प्रयास कर रहे हैं और इन स्थानो के भीतर बन्द झाँसी के
सैनिक लड रहे हैं । तब वे बुर्ज से नीचे उतर आई ।
एक पेड के नीचे पत्थर पर बैठकर सोचने लगी, 'झाँसी का सर्वनाश
होने को है । स्वराज्य की स्थापना अभी दूर है । परन्तु कर्म करने मात्र
का अधिकार है, फल से हमको क्या ?'
उठ खडी हुईं ।
जवाहरसिंह, रघुनाथसिंह, गुलामगौस, भाऊ बख्शी, गुलमुहम्मद;
भोपटकर इत्यादि सरदारो को बुलवाया । उन लोगो को अपना निश्चय
सुनाया —
'बाहर निकल कर लडो, गोरो को शहर से निकालो और झाँसी की
रक्षा करो ।'
सलाह सम्मति का न तो समय था और न मौका ।
गुलमुहम्मद ने कहा, 'हुजूर को शुक्रिया । फौरन चले । गोरो को
शहर से निकालें ।'
४१० झाँसी की रानी
रानी ने आदेश दिया, 'गोलन्दाज़ अपने अपने ठियो पर काम करते
रहें।'
भाऊ बख्शी ने आगे बढकर रानी के पैर पकड लिये ।
प्रार्थना की, 'सरकार मुझको बाहर साथ जाने की आज्ञा दी जाय ।
मेरी तोप पर किसी और को कर दिया जाय ।'
'अच्छा, गोलन्दाज़ो में से केवल तुम', रानी ने कहा, 'जल्दी करो ।
विलम्ब का काम नही है ।'
बख्शी साथ हो गया ।
भोपटकर की इच्छा न थी कि रानी बाहर जाकर लड़े, परन्तु वह
स्तब्ध रह गया । रानी फुर्ती के साथ तैयार होकर किले के बाहर हो
गईँ । साथ में पठान, बुन्देलखण्डडी इत्यादि पन्द्रह सौ सैनिक । पीछे
भोपटकर भी गया । दक्षिण की ओर से आ आकर गोरे महल के
पश्चिम की ओर बढ रहे थे ।
रानी झंझावात की तरह पहले दक्षिण की ओर झपटी, जहा से
अंग्रेजी सेना घुसी चली आ रही थी । रानी का छापा इतना प्रचण्ड था
कि अंग्रेजी सेना भागी । पूर्व की ओर के मकानो की आड से बन्दूके चलाने
लगी । तलवारो की मार के सामने वह बिलकुल न ठहर सकी ।
रानी ने चिल्लाकर कहा, 'आज प्रमाणित कर दो कि हिन्दुस्थानी
सिपाही की तलवार के सामने संसार का कोई योद्धा नही टिक सकता ।'
उनके दस्ते ने ऐसी तलवार चलाई कि गोरी पल्टन बिखर कर हट
गई, परन्तु मकानो की आड से गोलिया चलाने लगी । पाच सौ पठान
दक्षिण और पूर्व दिशाओ में फैलकर फिर भी गोरो को पीछे हटाते रहे—
और मरते रहे । रानी के महल और हाथीखाने के आसपास* टकसाल
तक गोरी सेना फैली हुई थी और उसके लिये मकानो की आड थी ।
उसका जवाब देने के लिये रानी की सेना भी उसी प्रकार और उसी
दिशा में फैली । गोरी सेना के कुछ सिपाही दबाव पड़ने के कारण
❉अब यहां सदर अस्पताल है । अस्पताल के उत्तर में टकसाल मुहल्ला ।
लक्ष्मीबाई ४११
पश्चिम दिशा की ओर खण्डेराव फाटक की ओर बढ़े। वहा उनको
अटकना पडा।
रानी उसी ओर बढ़ रही थी कि उन्होने देखा एक सिपाही किसी
मकान में से निकल पडा और अकेले उन कई गोरो से भिड़ गया। उसने
ऐसी तलवार चलाई कि कई गोरे हताहत हुये। कुछ और गोरे आ गये।
वह सिपाही घिर गया। तो भी वह अकेला उनको पछेलता गया। रानी
ने अपने घोडे को तेज किया। पीछे पीछे उनके सिपाही दौडे। रानी के
पहुचते पहुँचते वह सिपाही और गोरे पचकुइयो से नीचे की तरफ पहुच
गये। उस अकेले सिपाही ने फिर कई गोरो को तलवार के घाट उतारा,
परन्तु यकायक उस पर कई वार पडे और वह गिर गया। इतने में रानी
सैनिको सहित आ पहुँची। गोरे भाग गये।
रानी ने पास जाकर देखा—बरहामुद्दीन था। उसके मरने में कुछ
क्षण बाकी थे। बेचैन था। रानी घोडे पर से उतरी। बरहाम के सिर
पर हाथ फेरा। बहराम ने पहिचान लिया। उसने आंखे फाडी। पूरा
बल लगाया। लेकिन कठिनाई से बोल पाया, 'हुजूर, माफी।'
मुश्किल से रानी के मुह से निकला, 'तुम सच्चे सिपाही हो। माफ
किया।'
फिर जोर लगाकर बरहाम ने कहा, 'सरकार, जान नही निकलती।
मेरी चि ट्...ठी।'
रानी ने जेब से उसके इस्तीफे का कागज निकाला। 'यह लो',
रानी बोली।
'नही, स र ⸱ का...र', बडी मुश्किल से बरहाम ने कहा,
'फाड ⸱ डा ⸱ लि ये तब ⸱⸱ जान नि ⸱ क ⸱⸱ ले गी।'
रानी ने तुरन्त चिट्ठी की चिन्दी चिन्दी कर डाली।
बरहामुद्दीन के मुखमण्डल पर उस घोर पीडा मे आनन्द की छाप
लग गई। उसके अन्तिम शब्द थे 'ज ⸱⸱ ल ⸱ वा...अल्ला...ह...'
भाऊ ने आकाश की ओर दृष्टि करके कहा,
४१२ झाँसी की रानी
'आहा कैसा मीठा मरण है यह ! भगवन् मेरी भी ऐसी ही सद्गति
हो ।'
बरहामुद्दीन का प्राणान्त हो गया ।
रानी ने हुकुम दिया । इसी स्थान पर इसकी कबर बनाई जाय ।*
पास के रहने वालों को कबर का प्रबन्ध देकर रानी और उनके
सैनिक गोरो पर झपटे । वे भागे । अब पश्चिम से पूर्व होती हुई दक्षिण
तक रानी के सैनिको की एक पात सी बन गई । पीठ पर किला था ।
यकायक वृद्ध नाना भोपटकर रानी के सामने आ गया ।
बोला, 'पहले इस बूढे ब्राह्मण का वध करिये तब आप गोली खाइये ।'
रानी—'नाना साहब, यह क्या ?'
नाना—'आप देखती नही हैं, गोरे मकानो की आड से गोली चला
रहे हैं और आपके सैनिक हताहत हो रहे है । आप पर एक गोली पडी
कि समग्र झासी रसातल को गई । अभी अपने हाथ मे किला है । लडाई
जारी रखी जा सकती है । लौटिये या मेरा वध करिये ।'
रानी की समझ में आ गया ।
गुलमुहम्द पास आ गया था । उसने भी कहा, 'सरकार, बुड्ढा ठीक
बोलता हे । अन्दर चले ।'
उत्तरी फाटक से रानी किले मे भाऊ और नाना भोपटकर के साथ
चली गईं गुलमुहम्मद के साथ तीन सौ पठान ही भीतर जा सके ।
बाकी सब बाहर लडाई में मारे गये । बुन्देलखण्डडी सैनिक लगभग सब
कट मरे । किले के फाटक बन्द कर लिये गये ।
- बरहामुद्दीन की कबर उसी जगह बा० जासोनाथ चौधरी के बाग
में, और कबरो के पास है ।
लक्ष्मीबाई ४१३
[ ७६ ]
गोरो ने शहर के सब फाटको पर अपना प्रबन्ध कर लिया, उनको
अपने उन निशशस्त्र पुरुषो, स्त्रियो और बच्चो के खून का बदला लेना था,
जिनको बख्शिशअली इत्यादि बहुत थोडे से हिन्दुस्थानियो ने मारा था ।
पाच वर्ष की आयु से अस्सी वर्ष तक के जितने पुरुष मिले उनका कतल
शुरू कर दिया । हलवाई पुरा में आग लगादी । कुछ स्त्रिया अपने
सतीत्व के नष्ट होने के भय से कुओ में गिरकर मर गई । रोज का
आदेश था कि स्त्रियो को न मारा जाय, उनको जान बूझ कर गोरो ने
नही मारा । लेकिन अपने पति की रक्षा के लिये जो स्त्रिया उनकी आड
बनने के लिये आ गई वे गोलियो से मरी । झाँसी के कवि और गायक
भी लडे थे, वे मारे गये या घायल हुये । गवँयो मे केवल मुगलखा बचा
और नर्तकियो मे दुर्गा और एक और ।
गोरो ने घर घर में घुसना और सोना चांदी इत्यादि सामान लूटना
शुरू किया ।
शहर वाले राज महल के चारो ओर अङ्गरेजी सेना का सबसे
अधिक उपद्रव हुआ । नाटकशाला के सामने दक्षिण की ओर रानी का
अस्तबल था । उस अस्तबल को रानी के बुन्देलखण्डो सिपाहियो ने किले
की लढ़ाई में परिवर्तित कर दिया । थे लगभग कुल पचास ही । परन्तु
जब तक एक भी जिन्दा रहा अङ्गरेजो ने अस्तबल पर कब्जा नही कर
पाया । एक एक दीवार, एक एक कोठरी, एक एक ईट पर कब्जा करने
में अङ्गरेजो को न जाने कितने सिपाही बलिदान करने पडे ।
इसके बाद महल की एक एक इञ्च भूमि के लिये युद्ध हुआ । जब
महल के सब सिपाही खतम हो गये उस पर भी कब्जा हो गया । सब
सामान लूटा । एक बक्स में से यूनियन जैक झण्डा मिला, जिसे लार्ड
विलियम बेंटिक ने रामचन्द्रराव को दिया था महल के सिरे पर वह
झडा लगा दिया गया । महल के केवल उस भाग को छोडकर, जिस पर
यूनियन जैक फहरा रहा था, बाकी महल में आग लगादी गई । नाटक-
४१४ झांसी की रानी
'शाला भी न बची। सुन्दर पर्दे, जिनकी सहायता से शकुन्तला, रत्नावली
और हरिश्चन्द्र नाटक खेले जाते थे, खाक कर दिये गये।
और इसके बाद जो कुछ हुआ उससे उन बर्बरो की पाशविकता
इतिहास में अमिट अक्षरो में लिख ली गई—महल के सामने वाले
विशाल पुस्तकालय मे आग लगा दी गई ! थोडी ही देर में कलाओ का
वह भंडार अग्नि की गगनभेदी लौ फेकने लगा। कभी रोम, सिकन्दरिया
और राज-गृह में भी ऐसा हुआ था, परन्तु वह बर्बर युग था ! और यह
विज्ञान का सभ्य युग !!
रानी ने किले पर से देखा। उनके हाथ मे दूरबीन न होती तो भी
दिखलाई पड सकता था। पर दूरबीन ने सब कुछ स्पष्ट दृष्टिगोचर
करा दिया।
अस्तबल मिटा—फिर बन सकता था। राजमहल जला—उसके
बनाने वाले फिर उत्पन्न हो जायंगे। लेकिन पुस्तकालय ? वेद, शास्त्र,
पुराण, काव्य, इतिहास इत्यादि सस्कृति के और अरबी-फारसी के अनेक
हस्तलिखित ग्रन्थ जिनको प्रतिलिपि करने के लिये दूर दूर के विद्याव्य-
सनी आते थे, फिर कौन पैदा करेगा ? रानी का माथा घूमने लगा।
जिसको किसी कष्ट किसी समस्या, किसी विपत्ति ने कभी नही हिला
पाया था, वह जलते हुये पुस्तकालय को देखकर मूर्च्छित होने को हुई।
मुन्दर साथ थी। उसने संभाल लिया। रानी ने प्रबल प्रयत्न करके मूर्छा
को दूर किया। पानी मँगवाया, पिया। इतने में हलवाईपुरा और
कोरियो के मुहल्ला की आगो की लपटे दिखलाई दी। क्रन्दन, पुकार और
चीत्कार की समग्र ध्वनिया यकायक सुनाई पडी। जन-वध, कतले-ग्राम,
लोक-सहार का प्रत्यक्ष प्रमाण। रानी का हृदय धसने लगा।
'मुन्दर, मुन्दर, मेरी प्यारी झासी की यह कुगति, यह दुर्गति !
और मेरे जीतेजी ! मेरी आंखो के सामने !' रानी ने भरे गले से कहा।
गला फटसा गया। मुन्दर उनको खींचकर नीचे ले आई।
लक्ष्मीबाई ४१५
महल की चौखट पर बैठ कर वह रोईं। लक्ष्मीबाई रोईं ! वह
जिसकी आखो ने आसुओ से कभी परिचय भी न किया था ! वह जिसका
वक्षस्थल वज्र का और हाथ फौलाद के थे ! वह जिसके कोश में निराशा
का शब्द न था ! वह जो भारतीय नारीत्व का गौरव और शान थी !
मानो उस दिन हिन्दुओ की दुर्गा रोई ।
मुश्किल से आसुओ की अविरल धारा टूटी थी कि रामचन्द्र देशमुख
ने कर्तव्य वश समाचार दिया, 'सरकार, कुवर गुलाम गौसखां दुश्मन की
गोली से मारे गये ।'
रानी सिंहनी की तरह उछल कर खडी हो गईं । अङ्गरखे के छोर
से आंसू पोछ डाले । गला साफ किया ।
आज्ञा दी, 'भाऊ को उनकी जगह भेजो ओर लाश को महल के
पास ।'
आज्ञा पालन के लिये देशमुख चला गया । रानी मुन्दर को साथ
लेकर दक्षिणी बुर्ज के नीचे, जहा खुदाबख्श के शव के लिये कबर तैयार
हो चुकी थी, आईं । मोतीबाई वहा थी ।
पश्चिमी बुर्ज से भाऊ बख्शी अङ्गरेजी शिविर पर धडाधड़ गोलाबारी
कर रहा था । केन्द्रीय बुर्ज से रघुनाथसिंह । दक्षिणी बुर्ज शान्त थी ।
'मोतीबाई', रानी ने कहा, 'में दफनाने का प्रबन्ध करती हू, तुम तब
तक इस बुर्ज के तोपखाने को जगादो ।'
खुदाबख्श के शव के मोह मे मोतीबाई जरा ठमठमाई ।
रानी बोली, 'अभी विलम्ब है । कुंवर गुलाम गौसखा का भी शव
यही आ रहा है ।'
विस्फारित लोचन मोतीबाई ने विस्मय के साथ कहा, 'क्या उस्ताद
मारे गये ?',
'हा मोती,' रानी ने उत्तर दिया । मोतीबाई तोप पर चली गई ।
पहली बाढ दागी थी कि उस पर नजदीक से गोलियो की बौछार हुई ।
अंग्रेज किले के सदर फाटक के पास आ गये थे ओर उनको पास से