झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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राजा गंगाधरराव और रानी लक्ष्मीबाई का कुछ समय लगभग इसी
प्रकार कटता गया । सन् १८४० में (माघ सुदी सप्तमी स० १६०७) वे
सजधज के साथ (कम्पनी सरकार की इजाजत लेकर !) प्रयाग, काशी,
गया इत्यादि की यात्रा के लिये गये । लक्ष्मीबाई साथ थी । उनको किले
में बन्द रहना पडता था, इस यात्रा में भी तामझाम इत्यादि बन्द
सवारियो में चलना पडा, परन्तु नए-नए स्थान देखने के अवसर मिले ।
इस कारण बन्धनो का क्लेश न अखरा । काशी-यात्रा मे उनको देव-दर्शन
और जन्म-गृह दर्शन प्राप्त हुये ।
गगाधरराव का क्रोध समय-कुसमय न देखता था । एक दिन काशी
नगर मे सैर के लिये निकले । एक विचारा राजेन्द्र बाबू मार्ग में पड
गया । उसने प्रणाम तो किया, परन्तु खडे होकर ताजीम नही दी ।
शामत आगई । गगाधरराव ने उसको बेहद पिटवाया । उसने कम्पनी
सरकार मे फरियाद की ।
जवाब मिला, 'गगाधरराव एक बडे राजा हैं । यदि तुमको खडे
होकर ताजीम देना पसन्द न था तो अपने घर मे बैठे रहते !'
रानी को यह सब देख सुनकर काफी क्लेश हुआ था ।
तीर्थयात्रा के लिये झाँसी छोडने के पहले जब गगाधरराव को कम्पनी
सरकार ने शासन के अधिकार वापिस किये तब पहले का जमा किया
हुआ तीस-लाख रुपया कम्पनी ने उनको लौटाया था । उसका उन्होने
अपव्यय किया । अपने अनेक हाथियो में उनको सिद्धबकस नामक हाथी
बहुत प्यारा था । उसका सारा सामान सोने का बनवाया । और भी
अनेक हाथी घोडो का सामान-अम्बारी, हौदा, जीन, झूले इत्यादि-सोने
की बनवाई । काशी से एक तामझाम, जिस पर बढिया नक्कासी का
काम था, बहुत कीमत देकर मँगवाया । और भी काफी राजसी-ठाट इकट्ठा
किया । राजा प्रदर्शन के बहुत प्रेमी थे । रानी को प्रदर्शन बहुत कम