झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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गई और भवन बनना आरम्भ हो गया । शाश्वत धर्म का रूप बिगड
गया है । इसके सुधार के बिना वह भवन खडा न हो पायगा ।'
रानी—'हम लोग प्रयत्न करते रहे ?'
बाबा—'अवश्य । तुम तो भगवान कृष्ण और गीता की भक्त हो ।'
रानी—'आपने कैसे जाना ?'
बाबा मुस्कुराये ।
बोले, 'सब कहते हैं ।'
रानी—'मै पाठ करती हूँ, परन्तु समझते तो आप महात्मा लोग
ही है ।'
बाबा—'गृहस्थ से बढकर और कोई साधू नही । मुझसे कुछ और
नही हो सका, इसलिये कुटी बना ली ।'
सूर्यास्त होने को आया । रानी को सन्ध्या-ध्यान का स्मरण हुआ ।
कहा, 'बाबा जी, फिर कभी दर्शन करूँगी । आपकी इतनी बात से चित्त
को बहुत शान्ति मिली ।' और नमस्कार करके चली गईं ।
मार्ग में मुन्दर ने कहा, 'सरकार भी इन्ही बातो को बतलाया
करती हैं ।'
'परन्तु' रानी बोली, 'बाबा के समान होने में बहुत देर है ।'