झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें० ३६० झांसी की रानी
मुन्दर कुछ आश्चर्य, कुछ कुतूहल और कुछ शरारत के साथ देखने
लगी ।
रघुनाथसिंह के स्वर का रोष तुरन्त अवरोध में परिणत हुआ ।
बोला, 'मैने कहा था कि खा-पीकर आना। वैसे ही क्यो चली आई ?
मेरी बात की अवज्ञा क्यो की ?'
मुन्दर ने मुस्कराकर कहा, मैने भी तो जता दिया था कि यही
आकर खाऊँगी।'
रघुनाथसिंह के थके हुये चेहरे पर मुस्कराहट दौड गई। बोला,
'याद आ गया तो अब हाथ मुँह धोकर खाओ।'
'पहले आप', मुन्दर ने अनुरोध किया ।
रघुनाथसिंह ने हठ किया, 'पहले तुम ।'
'तुम' शब्द ने मुन्दर को पुलकित कर दिया बोली, 'मेरे हाथ से
खाना हो तो आप प्रारम्भ करो।'
'नही तो ?' रघुनाथसिंह ने प्रश्न किया ।
'नही तो क्यो, लड्डू अपने हाथ से खाने पड़ेगे।' मुन्दर ने उत्तर
दिया ।
रघुनाथसिंह ने स्वीकार कर लिया। हाथ मुँह धोया। मुन्दर ने एक
ओर बैठकर लड्डू खिलाये ।
रघुनाथसिंह ने प्रस्ताव किया, 'अब मै तुम को खिलाऊँगा।'
मुन्दर बहुत हँसी ।
बोली, 'अरे वाह ऐसा कही होता है ! मैं अकेले में बैठकर
खाऊँगी।'
रघुनाथसिंह मान गया । उसने सब कुछ पा लिया ।
उसको मृत्यु का कोई भय नही रहा ।
और मुन्दर को ?
लक्ष्मीबाई की सहेली को मृत्यु का डर !