झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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रानी ने रुखाई के साथ कहा, 'तुम मूर्ख मालूम होते हो । अपना
काम न करके दूसरो के पीछे पीछे घूमते हो । अपना ठिया देखो ।'
रानी आगे बढ गईं । साथ में जवाहरसिंह । जवाहरसिंह ने विनय
की, 'सरकार पठान मूर्ख नही है । पीरअली की जांच होनी चाहिये ।'
रानी ने उत्तर दिया, 'सामने का काम पहले निपटाओ और फिर
जांच करो । पता लगाना यह कौन दीवान साहब हैं, जो पीरअली के साथ
गया था ।'
नये सैनिको का प्रबन्ध करके रानी किले को लौट आई ।
जवाहरसिंह शहर के इन्तज़ाम में उलझ गया ।
रानी ने ज़रा सा अवकाश मिलने पर मोतीबाई से बरहामुद्दीन वाली
बात कही ।
मोतीबाई बोली, 'पीरअली बेईमानी कर सकता है । साथ में दीवान
दूल्हाजू गये होगे । आप उनसे रुष्ट हुई थी ।'
रानी ने कहा, 'जब तक जांच नही हुई है इन दोनो पर नज़र रखनी
चाहिये, परन्तु सहसा ऐसा कोई काम न करना जिसके लिये पीछे पछताना
पडे । पीरअली ने पहले अच्छे कार्य किये हैं और दीवान दूल्हाजू ने ओर्छा
फाटक की-अच्छी संभाल की है । इस समय हाथ में कोई बढ़िया
गोलन्दाज़ दूल्हाजू की जगह भेजने के लिए नही है ।'
'मेरे मन में आता है, मोतीबाई बोली, 'सुन्दर को दीवान साहब के
साथ-दिन के काम के लिये कर दीजिये । रात के काम के लिये किसी
और को भेज दिया जायगा ।'
रानी ने स्वीकार किया ।
सुन्दर रात को जागी थी । सोने के लिये तैयार हुई थी कि उसको
यह योजना बतलाई गई । सुन्दर की नीद भाग गई । वह नहा धोकर
और थोड़ा सा खा पीकर ओर्छा फाटक पर पहुँच गई ।
उस दिन भी घनघोर युद्ध हुआ । दोनो तरफ विकट नरसंहार ।
केवल दो बाते विशेष हुईं, ओर्छा फाटक की वह तोप जो दूल्हाजू के हाथ