झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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बरहामुद्दीन सागर खिडकी की तोप पर पीरअली की जगह आ
गया । पीरअली ने उससे कहा, 'आज बहुत से पते लगाने के लिये
अङ्गरेज़ी छावनी में जाना है ।'
'शौक से जाइये,' बरहाम बोला, 'अकेले ही जाइयेगा ? बड़ा
खतरनाक काम है ।'
पीरअली ने उत्तर दिया, 'अकेला ही जाऊँगा । दो आदमी होने से
खतरा बढ जायगा ।'
पीरअली खिडकी पर से उतरा । थोडी देर ही ठहरा था कि दूल्हाजू
आ गया । ओर्छा फाटक पर उसकी जगह सुन्दर आ गई थी ।
दूल्हाजू को बरहामुद्दीन ने नही देख पाया ।
पीरअली और दूल्हाजू मुहरी में धसे । धसते ही दूल्हाजू ने नाक
दबाई । धीरे से कहा, 'मीरसाहब यह तो बहुत सकरी और गन्दी
रास्ता है ।'
पीरअली धीरे से बोला, 'दीवान साहब वहाँ पहुँचने का यही एक-
मात्र मार्ग है ।'
उन दोनो के निकल जाने पर धीरे से बरहामुद्दीन मुहरी में उतरा
और आड ओट लेते हुये, पहले सन्त्री के छबीने तक चला गया ।
संत्री ने टोका । पीरअली ने बँधे हुये सकेत की भाषा में जवाब
दिया । वे दोनो छावनी मे चले गये ।
बरहामुद्दीन ने सोचा, 'पीरअली, अवश्य कोई घातक षडयन्त्र रच
रहा है । और वह झासी के लिये शुभ नही जान पड़ता । आज दूसरा
आदमी इसके साथ कौन है ?'
बरहामुद्दीन सावधानी के साथ लौट आया । हाथ पैर धोकर मुहरी
की बगल में बैठ गया और पीरअली की बाट जोहने लगा ।
दूल्हाजू के साथ पीरअली रोज के सामने पेश हुआ । स्टुअर्ट पास
था । पूछताछ शुरू हुई ।