झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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झासी की भाषा हिन्दी है । नाटक यदि हिन्दी में हो, तो हो, नही तो
मुझसे कोई सरोकार न होगा । मेरा निश्चय है ।'
सहेलियो ने स्वीकार कर लिया ।
नाटकमण्डली वालो से कहा गया । उनमें थोडे अभिनेता ही हिन्दी
जानते थे । उनकी यह कठिनाई दूर कर दी गई । झासी के हिन्दी जानने
वाले अभिनेता शामिल कर लिये गये । उस मण्डली ने हरिश्चन्द्र का
अभिनय उत्कृष्टता के साथ किया । मोतीबाई इत्यादि जानकारो तक ने
सराहना की । रानी ने मण्डली के प्रबन्धक को चार सहस्र रुपया पुरस्कार
दिया । मण्डली ग्वालियर चली गई ।*
रानी ललित कलाओ की प्रवल पोषक थी । उस कठिन और
चिन्ताकुल समय में भी रानी प्रत्येक नवागन्तुक गायक, वीणकार,
सितारिये इत्यादि को सुनने के लिये थोडा बहुत समय दिया करती थी
और उचित पुरस्कार भी । कवि, चित्रकार, शिल्पी कोई भी उन्मुख नही
जाता था । शास्त्री, याज्ञिक, ज्योतिषी, वैद्य, हकीम इत्यादि भी पोषण
पाते थे । अपनी इसी वृत्ति को वे स्वराज्य में विकसित और प्रसरित
देखना चाहती थी ।
पीरअली देर-सवेर सब महात्वपूर्ण समाचार नवाब अलीबहादुर के
पास बडी सावधानी के साथ' भेजता रहता था । झासी छोडने के कुछ
दिनो बाद वे घूमते-घामते दतिया पहुचे । वहा थोडे समय रहकर भाडेर
पहुच गये । झासी से दतिया १७ मील और भाडेर चौबीस ।
नवाब अलीबहादुर उन्ही स्थानो से अग्रेजो को काम के समाचार भेजते
रहते थे । रोज इत्यादि अंग्रेज जनरल झासी को अधिकृत करने के महत्व
को जानते थे । उन लोगो को नवाब से निरर्थक और सार्थक—सभी
तरह के - हाल समय समय पर मिलते रहते थे । मदनपूर युद्ध के पश्चात
झासी रोज का प्रथम लक्ष्य और पहला कर्तव्य बनी ।
- देखिये परिशिष्ट ।