झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१० झाँसी की रानी
रानी ने मुन्दर और सुन्दर को कुछ हिदायते देकर दूसरी दिशाओ में
भेजा ।
गुलामगौस ने अपनी तोपो से जल्दी जल्दी दो बाढे छोडी । नत्थेखां
की सेना ने जवाब दिया । गौस की तोपे बिलकुल बन्द हो गई । नत्थेखा
ने सोचा तोपची मारे गये । उसके सिपाही दीवार पर चढने के लिये बढे ।
इधर से बन्दूको की बाढ दगी । उसका कोई बडा असर नही हुआ । जब
बाढो पर बाढे दगी तब उसके सिपाही पीछे हटे । नत्थेखा ने निश्चय किया
कि ऊँची टौरिया पर तोपखाना चढा कर ओर्च्छा-फाटक और अगल-बगल
की दीवारो पर गोलाबारी करने से शहर के लिये मार्ग मिल जायगा और
फिर किले को अधिकृत कर लेना सहज हो जायगा । सागर-खिडकी की
ओर से बराबर गोलाबारी हो रही थी और उसका एक तोपखाना उस
ओर मोर्चा लगाये था । ओर्च्छा-फाटक की तोपे बन्द थी, इसलिये उसको
अपना यही उपाय महाफलदायक जान पडा ।
उसने ऊँची टौरिया पर अपनी तोपे चढा दी और फाटक पर बाढ
दागी । दीवारो पर उस बाढ का विनाशकारी प्रभाव पडा । तोपची उकता
उठे । रानी ने वर्जित किया ।
नत्थेखा की तोपो से दूसरी बाढ नही दगने पाई । टौरिया पर घम
घम हुआ और विकट चीत्कार और तुरन्त किले से चली हुई तोपो का
भयंकर गर्जन-तर्जन सुनाई पडा । भाऊ का निशाना अचूक बैठा । फिर
बाढ आई । इधर रानी ने गुलाम गौस को अपनी तोपो पर पलीता देने की
आज्ञा दी ।
अब नत्थेखा को मालूम हुआ कि किसका सामना कर रहा हूँ ।
उसने स्थिति को संभालने का प्रयत्न किया, परन्तु कुछ न बन पडा ।
तोपो और सामान को छोडकर नत्थेखा भागा । वह केवल एक दाग लगा
गया—लक्ष्मी-फाटक पर कर्नल जमाखा मारा गया ।
रात को लडाई बहुत धीमी गति से चली । परन्तु रानी की सावधानी
में रत्ती भर भी अन्तर नही आया ।