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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 31, कुल 526 में से

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पृष्ठ 31

२० $\qquad$ झांसी की रानी
[ २ ]
मनूबाई सवेरे नाना को देखने पहुँच गई। वह जग उठा था, पर लेटा
हुआ था। मनू ने उसके सिर पर हाथ फेरा। स्निग्ध स्वर में पूछा, 'नीद
कैसी आई ?'
'सोया तो हूँ, पर नीद आई-गई बनी रही। कुछ दर्द है।' नाना ने
उत्तर दिया।
मनू—'वह दोपहर तक ठीक हो जायगा। तीसरे पहर घूमने चलोगे
न ? सध्या से पहले ही लौट आयेंगे।'
नाना—'सवारी की धमक से पीडा बढने का डर है।'
मनू—'प्रारम्भ में कदाचित थोडी सी पीडा हो, परन्तु शीघ्र उसको
दाव लोगे और जब लौटोगे याद नही रहेगा कि कभी चोट लगी थी।'
नाना—'यदि पीडा बढ गई तो ?'
मनू—'तो सह लेना, फिर कभी गिरोगे तो चोट कम आवेगी।'
नाना—'और यदि आज ही फिर फिसल पड़ा तो ?'
मनू—'तो मैं तुमको फिर उठा लाऊँगी। चिन्ता मत करो।'
नाना—'और जो तुम खुद गिर पडी तो ?'
मनू—'तब मै फिर सवार हो जाऊँगी। किसी की सहायता नही
लेनी पडेगी और घर आ जाऊँगी।'
नाना—'मेरे बस का नही।'
मनू—'लड्डू खाओगे ?'
नाना—'इच्छा नही।'
मनू—'तब क्या इच्छा है ?'
नाना—'मुझे चुपचाप पडा रहने दो !'
मनू—'कब तक ?'
नाना—'तीन चार दिन लग जायेंगे।'
मनू—'किसने कहा ?'