झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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विन्ध्यखण्ड की समग्र जनता में सनसनी फैली हुई थी । यहा की
जनता ने कभी किसी अत्याचारी का शासन आसानी के साथ नही माना ।
स्वाभिमान को आघात पहुचा कि व्यक्ति ने सिर उठाया और -हथियार
हाथ में लिया । शायद भारत का यही खण्ड एक ऐसा है जहा डाकू को
'बागी' कहते हैं ।
विन्ध्यखण्ड छोटी-बडी रियासतो में बिखरा हुआ था । सब बडी
बडी रियासते कम्पनी सरकार का साथ दिये थी । बानपूर और शाहगढ
साधारण राज्य थे । ये राज्य विप्लव मे शामिल हुये ।
रानी को इन दोनो राजाओ के स्वाधीनता-प्रिय विचारो का पता
था । इन दोनो को उन्होने स्वराज्य-स्थापना के सग्राम में भाग लेने के
लिये पत्र भेजे । वे दोनो लडने के लिये उद्यत हो गये ।
बानपूर राज्य के राजा मर्दनसिंह ने अपनी सेना को लेकर सागर
जिले में प्रवेश किया और खुरई तहसील तथा नरयावली के परगने पर
अधिकार कर लिया । इसके उपरान्त वह झासी जिले के दक्षिण में
ललितपूर आया और चन्देरी की ओर बढा । चन्देरी अगरेज़ो के अधिकार
मे थी । वहा विप्लव नही हुआ था ।
वहा के हाकिम परगना को राजा मर्दनसिंह के आने की ख़बर एक
चन्देरी निवासी ने दी । वह कचहरी में था । रैडटेपिज्म ( लाल फीता-
जाब्ता) का पुजारी था ।
खबर देने वाले ने कहा, 'साहब बलवा हो गया है । फौज चढी चली
आ रही है ।'
साहब उपेक्षा के साथ बोला, 'अर्जी लिखवाकर लाओ । ज़बानी नही
सुना जायगा ।'
थोडी देर में राजा मर्दनसिंह आ गया । उसने बिना किसी अर्जी-
दरख्वास्त के चन्देरी को घेर लिया और बिना किसी अर्जी-पुर्जी के
चन्देरी में अग्रेजी शासन को खतम कर दिया ।