झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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छाना कि कहीं कुछ रक्खा हो । वहा कुछ भी न मिला । शाम के बाद
लडाई कुछ ढीली हुई । अङ्गरेजो ने किसी प्रकार रानी के पास अपनी
भूख का समाचार भेजा ।
रानी ने दो मन रोटिया तत्काल बनवाईं । काशीबाई से कहा, 'तू
इन रोटियो को किसी प्रकार अङ्गरेजो के पास पहुँचा । तुझको सारे गुप्त
मार्ग मालूम हैं, सुन्दर और मुन्दर को साथ लेजा, और कोई न जावे।
जहां मशाल की अटक पढे जला लेना ।'
सहेलिया रानी की दया को जानती थी, परन्तु उसकी सीमा को नही
देखा था ।
काशी ने विनम्र शांत स्वर में कहा, 'सरकार, यदि हम लोग इस
परिस्थिति में पढे होते तो क्या अङ्गरेज़ लोग हमको दाना-पानी देते ?'
रानी मे उत्तर दिया, 'अङ्गरेजो जैसे बनकर हम अपने और उनके
बीच के अन्तर को क्यो मिटाएँ ? और फिर इन लोगो को भूखा मारकर
आगे बढना अनुष्ठान को कलुषित करना है ।'
रानी मुस्कराई । काशी का हृदय आभासमय हो गया ।'
परन्तु फिर भी उसने सवाल किया, कब तक आप इनको इस प्रकार
खिलायेंगी ?'
'जब तक मेरी निज की सेना तैयार नही हो गई,'रानी ने कहा 'जब
सेना तैयार हो जावेगी, मैं उन लोगो के हथियार रखवालूँगी और
कही सुरक्षित स्थान में क़ैद कर दूँगी ।'
उन तीनो सहेलियो ने रोटियो के गट्ठर पीठ पर लादे और गुप्त मार्ग
में होकर किले में ले गई । गार्डन इत्यादि ने उन लोगो को प्रणाम
किया । उनमें एक व्यक्ति मार्टिन नाम का था । मार्टिन ने सुरंग का
रास्ता देख लिया । दूमरे दिन फिर ये तीनो किले में दो मन रोटिया दे
आई । मार्टिन चुप चाप पीछे पीछे आया और गुप्त मार्ग से बाहर निकल
कर आगरा चला गया । सहेलियो को या किसी को भी नही मालूम
पड़ा ।