झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउदय
[ १ ]
बर्षा का अन्त हो गया । कुवाँर उतर रहा था । कभी कभी झीनी
झीनी बदली हो जाती थी । परन्तु उस सन्ध्या के समय आकाश बिलकुल
स्वच्छ था । सूर्यास्त होने में थोडा सा विलम्ब था । बिठूर के बाहर गगा
के किनारे तीन अश्वारोही तेजी के साथ चले जा रहे थे । तीनो
बाल्यावस्था मे । एक बालिका, दो बालक । एक बालक की आयु
१६, १७ वर्ष, दूसरे की १४ से कुछ ऊपर । बालिका की तेरह से कम ।
बडा बालक कुछ आगे निकला था कि बालिका ने अपने घोडे को एड
लगाई । बोली, 'देखूँ कैसे आगे निकलते हो।' और वह आगे हो गई ।
बालक ने बढने का प्रयास किया तो उसका घोडा ठोकर खा गया, और
बालक घडाम से नीचे जा गिरा । सूखी लकडी के टुकडे से उसका सिर
भिड गया । खून बहने लगा । घोडा लौटकर घर की ओर भाग गया
बालक चिल्लाया, 'मनू मे मरा।'
बालिका ने तुरन्त अपने घोडे को रोक लिया । मोड़ा, और उस
बालक के पास पहुंची । एक क्षण में तड़ाक से कूदी और एक हाथ से घोडे
की लगाम पकडे हुये झुक कर घायल बालक को ध्यान पूर्वक देखने लगी ।