झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
पृष्ठ 243, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ें२३२ झांसी की रानी
'मैं उमसे आज ही बात करूंगा । आप तो रानी साहब से बात
करने के लिये ठहरेंगी ?'
फिर कभी मिल लूंगी । आप मेरी बात उनसे कह दीजियेगा । मैं
जाती हूं ।'
मोतीबाई समझ गई थी कि तात्या इत्यादि बिलकुल एकान्त में,
रानी से बातचीत करना चाहते हैं, इसलिये वह नही ठहरी ।
पूजन के उपरान्त नाना साहब और तात्या की भेंट रानी से हुई ।
रानी लक्ष्मीबाई आज बिलकुल लक्ष्मी सी भासित होती थी ।'
नाना ने कहा, 'मैने अपने एक विश्वस्त आदमी अज़ीमुल्लाखा को
विलायत भेजा था । अर्जी, अपील स्वीकृत नही हुई । हो जाती तो कुछ
रुपया मिल जाता । कम से कम दादा साहब के ज़माने का जो छयासठ
हज़ार रुपया बाकी है, वही मिल जाता । परन्तु अङ्गरेजी सरकार तो
बेईमान और अन्यायी है । उसने सब नामंजूर कर दिया ! इसका अब
अधिक रञ्ज नही है । रुपये की कमी पूरी हो ही जावेगी । अज़ीमुल्ला
देश विदेश घूमा है । वह इटली गया, तुर्की में रहा, रूस भी पहुंचा
और ईरान होकर लौट आया । उसने तुर्की के साथ चिट्ठी पत्री की है ।
इटली में इस समय एक प्रबल पुरुष गेरीबाल्डी नाम का है । वह अङ्गरेज़ी
जहाज़ी बेडे को अपने जहाज़ी बेडे से नष्ट कर देगा । रूस से मदद मिलेगी ।
सब कहते हैं, कि अङ्गरेज़ हिन्दुस्थान में खुल्लमखुल्ला और आडे ओट लेकर
बहुत निन्दनीय काम कर रहे हैं । बहादुरशाह बादशाह ने ईरान के शाह
से लिखा पढी की है । काबुल तो हतोत्साह है, परन्तु शायद ईरान
बादशाह की कुछ सहायता करे ।'
रानी — 'ऊपर ऊपर इन बातो का प्रभाव अङ्गरेजो पर अच्छा पड़ेगा,
परन्तु वास्तव में कार्य बहुत दृढ़ता और प्रबलता के साथ, अपने देश
ही में होना चाहिये । मुझको विश्वास है कि जनता अपने साथ है । वह
बहुत बड़ा बल है । अङ्गरेजो के हाथ में सीखी सिखाई हिन्दुस्थानी फौज
है । वह सम्पूर्ण रूप में अपने हाथ में आ जानी चाहिये । तोप ढालने वाले