झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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'हूँ ।'
'हू क्या ? पक्का वायदा रानी साहब की सेवा के लिये करिये ।'
'मेरी जबान ही क्या वायदा करेगी, मेरा रोम रोम वायदा करता है ।'
'अब मुझको भरोसा हो गया । मैने अलीबहादुर साहब की नौकरी
और जासूसी के सम्बन्ध में इसलिये पूछा था कि देखूं आप कितने पानी
में हैं । परीक्षा ले ली । आप सफल हुये ।'
'कुछ करके दिखलाऊँगा तब कहियेगा ।'
'तभी और कुछ भी कहूंगी,' मोतीबाई मुसकराई ।
खुदाबख्श की हसरत जागी ।
बोला, 'कभी तो कह सकूंगा कि अब मै आपका कैदी हो गया ।'
मोतीबाई ने मुस्कराते हुये कहा, 'मगर अभी कैद की घड़ी नही आई
है । जिस दिन रानी साहब स्वराज्य कायम करके उत्सव मनायेगी मैं
अखीरी बार नाचू गी, और उस दिन आपकी कैद में हो जाऊँगी । तब
तक आपकी और मेरी अस्मत — दोनो की — उस देवी के हाथो रहेगी,
जो झाँसी की रानी कहलाती है और कहलावेगी ।'
उस नर्तकी का मुखमण्डल उस समय दिव्यता से भर गया ।
खुदाबख्श सिपाही था । उसका खून जोश खा गया ।
मुट्ठी बाधकर बोला, 'ऐसा ही होगा बाई जी । मुझको कभी चूकते
पाओ, तो मेरे मुँह पर थूक देना । महारानी साहब से कह देना कि
खुदाबख्श उनका पुराना नौकर — सिपाही है, जब उसकी जरूरत पडे, वे
कहला भर दे । अपने सीने पर गोली लेने के लिये तुरन्त आ खडा होगा ।
वेतन या भत्ते का नाम न लेना । दो वक्त खाने के लिये उन्ही का दिया
हुआ मेरे पास अभी काफी है ।
'मुझको आज बहुत खुशी है', मोतीबाई ने सयत स्वर मे कहा, 'मैं
रानी साहब को कल ही सुनाऊँगी । मगर अर्ज है कि नवाब साहब और
पीरअली से मत कहना ।'